अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

November 12, 2007

हिन्दी ब्लॉगों की बढ़ती संख्या

Filed under: Hindi, भाषा-वाषा, हिन्दी — anileklavya @ 11:57 pm

कुछ ही साल पहले तक हालत यह थी कि इंटरनेट पर हिन्दी में पढ़ने के लिए वेबदुनिया के अलावा मुश्किल से ही कुछ मिलता था। उसके लिए भी कई जतन करने पड़ते थे। बहुत से लोगों की कोशिशों, यूनीकोड के बढ़ते चलन आदि के कारण अब इंटरनेट पर इतनी सामग्री तो हिन्दी में हो ही गई है कि आप एक हफ़्ते या महीने भर में सब कुछ पढ़ डालने की बात नहीं सोच सकते। अकेले ब्लॉगों की ही संख्या रोज़ाना बढ़ती जा रही है।*

फिर भी अभी एक कमी जो मुझे बहुत खलती है वह यह है कि हिन्दी साहित्य के बारे में बहुत कम सामग्री है। अगर इस कमी को पूरा करने की दिशा में आप कुछ करना चाहते हैं (बिना किसी धनलाभ के) तो आप मुझे संपर्क कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप किसी भी साहित्यिक कृति के बारे में जानते हैं जो इलैक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध है, तो उसे सबके लिए इंटरनेट पर डाला जा सकता है। या और कुछ नहीं तो आप दो चार दिन या हफ़्ते या महीने में किसी बड़े लेखक की कोई कहानी या कविता या निबंध टाइप करके मुझे भेज सकते हैं। रचना के साथ आपका नाम भी शामिल किया जा सकता है। गुटनबर्ग जैसी न जाने कितने वेब स्थल अंग्रेज़ी (और अन्य भाषाओं) के लिए उपलब्ध हैं। हिन्दी में भी तो ऐसा कुछ होना चाहिए। जितना अभी है उससे कहीं ज़्यादा।

* अपना भी ज़रा सा योगदान इसमें है, यह व्यक्तिगत रूप से थोड़ी सी संतोषजनक बात है: हिन्दी ज़ेडनेट के अतिरिक्त कुछ चीजें यहाँ देखी जा सकती हैं (अधिकांश अभी प्रयोगशाला में ही हैं):

यह सेल्फ़ प्रमोशन तो हो सकता है, लेकिन तब दिल को थोड़ी तकलीफ़ होती है जब गूगल, याहू, ए ओ एल के भारतीय भाषाओं पर काम की खबरें तो बड़े शोर शराबे के साथ छपती हैं और बिना किसी मदद (वित्तीय या कोई अन्य) के अलावा काम करने वाले हम जैसे लोगों के काम को साफ नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

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