हमें गुमान कि बन सकते
निराला मुक्तिबोध हम भी
उनका कहना तुम बन सकते
बहुत हुआ तो काका हाथरसी
इस सोच से शुरू में
हमें थोड़ी शर्म-सी आती
लेकिन फिर हमारी आत्मा
हमें ये याद दिलाती
कि काका का काम था हँसाना
नुकसान किसी को ना पहुँचाना
और काका के पाठक तो
अब भी हैं दसियों हज़ार
निराला मुक्तिबोध को
जानते पढ़ते कुल दो-चार
काका ने तो बहुतों का
दिल खुश कर दिया
निराला मुक्तिबोध ने
किसी का क्या कल्लिया
पर लाख टके की बात
तो सीधी-सी है ये
कि कसाव अबसदाबादी
से तो हर हाल में बेहतर हैं
अपने बुढ़ऊ काका हाथरसी
एक बस छोटी सी
दिक़्क़त है यही
किसी काकी के बिना
कैसे होगा बनना
कोई काका हाथरसी
[2009]











Cool! Very cool! You write well.
Just one point: (I am assuming you are talking about Suryakant Tripathi Nirala here) – I prefer Nirala to Kaka Hathrasi any day. But that is just me.
Continue blogging. I will follow your blog more often.
Cheers!
Comment by Amitabh — February 20, 2009 @ 7:56 pm |
Amitabh:
Yes, the same one: Suryakant Tripathi Nirala. There is only one of his kind.
विष्णु बैरागी जी:
काका की कविताओं के साथ जब हम बड़े हुए हैं, तो उनसे अपने कठिन क्षणों को आसान कर लेने के बाद साहित्यिक जोश में उनका नाम लेना भी गवारा ना करें, ऐसे हमारे संस्कार नहीं हैं (ये संस्कार चाहे जहाँ से भी मिले हों और उनके बनने में चाहे निराला और मुक्तिबोध का भी हाथ क्यों ना हो)। आपको अच्छा लगा तो हमें भी खुशी हुई।
Comment by anileklavya — February 20, 2009 @ 8:45 pm |
निराला, मुक्तिबोध बनना मुश्किल है या आसान, कहना मुश्किल है किन्तु ‘काका’ बनना अत्यध्रिक दुरुह है। ‘काका’ बनने के लिए आदमी को ‘निर्मल मन’, ‘पारदर्शी व्यवहार’ और ‘उदार ह्रदय’ होना पडता है। कबीर ने तो कहा था – ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।’ ‘काका’ तो इससे आगे बढ गए थे – ‘सब काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।’
आपने ‘काका’ पर लिखा। मन भीग आया।
धन्यवाद और आभार।
Comment by विष्णु बैरागी — February 20, 2009 @ 8:28 pm |
अनिल जी,बहुत बढिया लिखा है।चिन्ता ना करें काकी भी मिल जाएगी कहीं ना कहीं।
Comment by परमजीत बली — February 20, 2009 @ 8:51 pm |
निराला, मुक्तिबोध और काक-सबकी अपनी अपनी जगह है.
Comment by sameer lal — February 20, 2009 @ 9:52 pm |
काक= काका पढ़ें.
Comment by sameer lal — February 20, 2009 @ 9:52 pm |
अच्छी प्रस्तुति!
—
गुलाबी कोंपलें
सरकारी नौकरियाँ
Comment by विनय — February 20, 2009 @ 10:00 pm |
टिप्पणियों के लिए सभी को धन्यवाद। पहली बार इस चिट्ठे पर इतनी टिप्पणियाँ हुई हैं।
समीर जी, बात बिल्कुल सही है – सबकी अपनी-अपनी जगह है।
Comment by anileklavya — February 21, 2009 @ 5:44 pm |