अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
ज़ोर-ज़ोर से
रगड़-रगड़ रगड़-रगड़
इतना करता
शोर मगर शोर मगर
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़
क्यूँ? कुछ हुआ क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।
करना था इसे
जगर-मगर जगर-मगर
करते जाते
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
बोल-तोल से
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़
टुकड़े-टुकड़े
तितर-बितर तितर-बितर
बुरा है लेकिन
हशर-बशर हशर-बशर
हाथों में पड़ गए
छाले मगर छाले मगर
कतर-कतर कतर-कतर
बोलो भाई, पहुँचे क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
चलती जाती
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़
अब तो बहुत देर हो आई
कुछ और नहीं क्या भाई?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।
बहे जा रही
लाल-लाल
ज़हर-लहर ज़हर-लहर
चले जा रही
इधर-उधर इधर-उधर
मोड़-तोड़ से
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
बोलो भाई
तुम तक पहुँची क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।
[2009]











हिंदी काव्य मंच :: सुन्दर रोचक प्रस्तुति बधाई
Comment by pradeep manoria — February 26, 2009 @ 10:07 am |
बढ़िया रचना है।बधाई स्वीकारें।
Comment by परमजीत बली — February 26, 2009 @ 12:18 pm |
[...] से वो जो भी अर्थ निकाल सके. अभी अभी काल कविता पढी तो उस ठक-ठक महाकाव्य की याद आ [...]
Pingback by ठक-ठक महाकाव्य « परिचर्चा — February 27, 2009 @ 6:58 pm |
आपकी तारीफ में एक पोस्ट लिख डाला. आशा है क्षमा करेंगे.
Comment by कौतुक [Kaotuka] — February 27, 2009 @ 7:01 pm |
कौतुक जी,
तारीफ़ में पोस्ट लिखा जाना तो सम्मान की बात है। तर्क से तो मैं परिचित हूँ (खुद भी दिया है), लेकिन उसके लिए यह नाम (ठक-ठक तर्क) अच्छा है।
Comment by anileklavya — February 28, 2009 @ 10:48 am |
[...] से वो जो भी अर्थ निकाल सके. अभी अभी काल कविता पढी तो उस ठक-ठक महाकाव्य की याद आ गयी. [...]
Pingback by ठक-ठक महाकाव्य « परिचर्चा — September 13, 2009 @ 2:46 pm |