अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

April 22, 2009

झगड़ा नको

चलो बहुत हो गया
कसाई और बकरे का झगड़ा
अब हाथ मिला लेते हैं
आज से हमारी-तुम्हारी दुश्मनी खत्म

आगे वही बढ़ते हैं
जो साथ मिल के चलते हैं
अब से हम-तुम भी साथ-साथ चलेंगे
मिल-जुल के सफ़र करेंगे

बहुत से हैं दुनिया में
जो झिक-झिक में वक़्त ज़ाया करते हैं
या फिर बड़ी-बड़ी बातें किया करते हैं
जहाँ भाई-चारे से काम चल सकता है
वहाँ बेकार की बहस में लगे रहते हैं

हमने भी यह ग़लती की अब तक
चलो आज से इसे सुधार लेते हैं
एक-दूसरे से कड़वी बातें नहीं कहेंगे
प्यार-मुहब्बत से ज़िंदगी भर रहेंगे

न तुम हमें काटो
न हम तुम्हें काटेंगे
ये एक-दूसरे को काटना खत्म
एक नये युग की शुरुआत करेंगे

दुनिया है और दुनिया में ज़िंदगी है
तो कटना-काटना तो होता ही रहेगा
पर अब मिल-जुल कर काटा करेंगे

कभी बकरा मिलेगा तो कभी कसाई मिलेगा
पर एकता की ताक़त के सामने कौन टिकेगा?

February 14, 2009

गुलाबी कपड़ा

वात्स्यायन
खजुराहो
कोणार्क
विजयनगर

कालिदास
शाकुन्तला

रीति-काल
नायिका-भेद
तंत्र-तांत्रिक

चरस-गांजा

नागा-बाबा

सोमरस
अप्सराएँ
नृत्य
देवी-देवता
देवगुरू
शिव-शक्ति मिलन
सृष्टि का रहस्य

स्वर्ग
सुना है
आर्यावर्त में
एक अच्छी जगह है
अफ़सोस मगर
पहुँच से बाहर है
और दरवाज़े के बाहर
लाशें यहाँ-वहाँ पड़ी हैं
मरियल शरीरों का मजमा है
बीमारों की भारी भीड़ है
और है संस्कृति का उधार लिया
फटा ढोल बजाते
रक्षकों-भक्षकों दंगाइयों का जुलूस
जिनकी पहुँच ओबामा तक फैली है
और जिनकी सोच ओसामा से मिलती है

गुलाबी कपड़ा
उन्हें कुछ याद दिलाने की
एक खीजी हुई
कोशिश हो सकती है

 

[2009]

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