अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

May 10, 2008

साम्राज्य और साइकल

संपन्न शक्तिशाली साम्राज्य
जो कि सुना है
आश्चर्यजनक रूप से
सुसंस्कृत भी था
जहाँ तेनालीराम जैसे दरबारी
कुछ वैसे ही रहते थे
जैसे अकबर के यहाँ बीरबल

बड़ी घटिया उपमा है
पर मैं झूठ बोलने से
बचना चाह रहा हूं
वैसे भी मैं कवि नहीं हूं
मेरी बोली तो
खड़ी बोली है

तो खड़ी बोली में
कहा जाए तो
बारिश का मौसम है
रिमझिम रिमझिम
इतनी ही कि कैमरा भी
बचा के रखा जा सके
तस्वीर खींचते हुए भी

भीड़ वगैरह भी नहीं है
आप आराम से भ्रमण का
पूरा मज़ा ले सकते हैं

छोटे-छोटे पहाड़
बड़ी-बड़ी चट्टानें
साफ़-सुथरी सड़कें
सब तरफ पेड़-पौधे
पत्तियाँ भी घास भी
फूल भी और उन पर
मंडराने वाले भी
तितिलियाँ भी होनी चाहिए
पर आखिरी दो मदों की
याद मुझे नहीं आती
भूल-चूक लेनी-देनी

ऊपर ऐसे बादल
कि तस्वीर खींचने से
मन ही न भरे
और हाँ
नदी भी तो है
अपने उफान के चरम पर
लेकिन छोटे से साम्राज्य की
छोटी सी तो नदी है
इसलिए चरम भी
अनुपात में ही है

सुना है हमेशा ऐसा नहीं होता
भ्रमण के भी मौसम होते हैं
तब हर तरफ भीड़ होती है
ऐसी सफाई और हरियाली भी
नहीं पाएंगे आप
नदी में इतना पानी भी
नहीं पाएंगे आप
रिमझिम बारिश तो खैर
नहीं ही पाएंगे आप

मुझे पता नहीं था
तकदीर (कभी तो) अच्छी थी

लेकिन एक बात है
क्या तब भी यहाँ घूमने में
इतना ही मज़ा आता होगा
जब कि साम्राज्य गिरा नहीं था

दो हज़ार साल पहले के
रोम में भ्रमण का मज़ा
कितना आता होगा
यह किससे पूछा जाए

साम्राज्य और साइकल

दो-तीन राजधानियों की बात
तो जानता हूं मैं
चतुर दरबारी तो
वहाँ भी बहुत से हैं
लेकिन भ्रमण …

जाने दीजिए

मेरा तो मन हो रहा है
मैं भी एक साइकल
किराये पर लेकर
फिर से घूमने निकल जाऊं

वाहन पर चढ़ कर जाऊं वहाँ
पहले पैदल गया था जहाँ

कुछ तो तुक हो

थक जाने पर साइकल को
पेड़ के नीचे खड़ा करके
आराम किया जा सकता है

पतन को पा चुके साम्राज्य में
रिमझिम रिमझिम
बारिश के मौसम में
लगभग आकर्षक रूप से
घुमावदार और चढ़ावदार
लगभग स्वाभाविक रूप से
कच्ची और टूटी-फूटी
सड़क के किनारे
लगभग अपेक्षित रूप से
धीर-गंभीर और छायादार
लगभग निराशाजनक रूप से
छोटे और हल्के-फुल्के
एक पेड़ के नीचे
खड़ी हुई एक साइकल

सड़क के होने का
रहस्य बताते हुए

और शायद साम्राज्य
के न होने का भी

जहाँ साम्राज्य था
वहाँ अब साइकल है
पर मुझे कुछ खास
अफ़सोस भी नहीं है

यहाँ तो फ़िलहाल मुझे
साइकल, पेड़ और सड़क
काफ़ी भा रहे हैं
जहाँ पृष्ठभूमि में स्थित है
साम्राज्य का एक अवशेष

April 19, 2008

हिन्दी ज़ेडनेट - नये अनुवाद (1)

तो आखिर मैंने हिन्दी ज़ेडनेट के लिए तीन और अनुवाद पूरे कर ही दिए। इतना समय लगने का एक कारण यह था (इसके अलावा कि मेरी उम्मीद के विपरीत और कोई अभी तक इस काम में शामिल होने के लिए आगे नहीं आया है) कि एक लेख काफ़ी लंबा था और उसमें दो कविताओं के उद्धरण थे, जिनमें से एक शायद दुनिया की सबसे अधिक पढ़ी गई कविताओं में से एक है।

उम्मीद है कविता अनुवाद के बाद भी कविता जैसी ही लगेगी।

नये अनुवाद ये हैं:

  • ग़ैर-टिकाऊ अविकास: नोम चॉम्स्की
  • कला, सच और राजनीति: हैरॉल्ड पिंटर
  • सभ्यताओं का टकराव: नोम चॉम्स्की

और हाँ, ज़ेडनेट की साइट पूरी तरह बदली जा रही है, परिणामतः हिन्दी ज़ेडनेट भी यहाँ से अब यहाँ आ गया है।

और यह भी कि कुल अनुवादों की संख्या अब एक दहाई यानी दो अंकों तक पहुंच गई है।

तीन अंकों तक अकेले पहुंचाना मुश्किल होगा, फिर भी…

Blog at WordPress.com.