हमें गुमान कि बन सकते
निराला मुक्तिबोध हम भी
उनका कहना तुम बन सकते
बहुत हुआ तो काका हाथरसी
इस सोच से शुरू में
हमें थोड़ी शर्म-सी आती
लेकिन फिर हमारी आत्मा
हमें ये याद दिलाती
कि काका का काम था हँसाना
नुकसान किसी को ना पहुँचाना
और काका के पाठक तो
अब भी हैं दसियों हज़ार
निराला मुक्तिबोध को
जानते पढ़ते कुल दो-चार
काका ने तो बहुतों का
दिल खुश कर दिया
निराला मुक्तिबोध ने
किसी का क्या कल्लिया
पर लाख टके की बात
तो सीधी-सी है ये
कि कसाव अबसदाबादी
से तो हर हाल में बेहतर हैं
अपने बुढ़ऊ काका हाथरसी
एक बस छोटी सी
दिक़्क़त है यही
किसी काकी के बिना
कैसे होगा बनना
कोई काका हाथरसी
[2009]










