अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

June 18, 2008

उम्मीद पर दो नाउम्मीद कविताएं

[ये ‘कविताएं’ मैंने कुछ वर्ष पहले लिखी थीं। ये चाहे मेरे आज, इस वक़्त, के मानस से मेल न खाती हों, पर इनसे हाथ धो लेने का मेरा कोई इरादा नहीं है। इनका साहित्यिक मूल्यांकन जो भी किया जाए। चाहे इन्हें साहित्यिक कहा भी जाए या नहीं।]

मेरी उम्मीद कुछ ज़्यादा है

उम्मीद पे दुनिया कायम है
ऐसा उनका कहना है
क्या आप ठीक-ठीक बता सकते हैं
ये उम्मीद है कहाँ
मेरे चारों तरफ?
मेरे चारों तरफ जो लोग हैं उनमें?
वही जो हँसते रहते हैं और खुश हैं?
जो आनंद उठाने में संगठित हैं
मैं देखता हूँ उनको
लेकिन मुझे दिखते हैं संभावित नाज़ी
संभावित आततायी
संभावित तानाशाह
संभावित हत्यारे
रिश्वत देने और लेने वाले
शोषक और उत्पीड़क
और सिर्फ़ संभावित ही नहीं

उनके साथ ऐसा किया जाता है
और वो दूसरों के साथ करते हैं
उत्पीड़ित ही उत्पीड़क बन जाते हैं
जब उन्हें मौका मिलता है
वो ऐसा उनके साथ नहीं करते
जो जवाब में वही कर सकते हैं
वो अपने साथियों के साथ ऐसा नहीं करते
अरे नहीं, मैं गलत कह गया
वो अपने साथियों के साथ भी ऐसा कर सकते हैं
अगर करने की कीमत चुकाने का डर न हो

ये बदला नहीं है
क्योंकि वो ऐसा ज़्यादातर उनके साथ करते हैं
जिन्होंने इनके साथ ऐसा नहीं किया था
जैसे कि नाज़ी जर्मनी में
इस्राइल के फ़िलिस्तीन में
आपके घर के पास बाज़ार में
आपके दफ्तर के सामने सड़क पर
वहाँ जहाँ आपके बच्चे पढ़ते हैं
दरअसल ये पढ़ाई तो
उससे भी पहले शुरू हो जाती है

वो हँसते हैं और बेवकूफी की बातें करते हैं
बेवकूफी की बातें करते हैं और हँसते हैं
वो ऐसा करते हैं नाश्ते पर
दोपहर के खाने पर
रात के खाने पर
अपने घरों में
गलियों में
दुकानों में
दफ्तरों, ट्रेनों, बसों में

बुरे लोग बेवकूफी की बातें करते हैं
अच्छे लोग बेवकूफी की बातें करते हैं
बेवकूफ लोग बेवकूफी की बातें करते हैं
बुद्धिमान लोग बेवकूफी की बातें करते हैं
बेवकूफी बुद्धिमानी है
आत्म-प्रवंचना समझदारी है
अज्ञान ज्ञान है
क्योंकि ब्लिंकर ज़ेवर होते हैं
वो जानना नहीं चाहते
लेकिन फैसला सुनाना चाहते हैं

वो हँसते खूब हैं
हत्या करते हैं और हँसते हैं
हत्याएं होते देखते हैं और हँसते हैं
यातना देते हैं और हँसते हैं
यातना देखते हैं और हँसते हैं
दूसरों का जीवन नरक बनाते हैं और हँसते हैं
दूसरों को नारकीय जीवन जीते देखते हैं
और हँसते हैं
बलात्कार, अत्याचार, उत्पीड़न और हँसी
अन्याय और हँसी
आडंबर और हँसी
अशिष्टता और हँसी
बेईमानी और हँसी
उनका हास्य ब्लैक ह्यूमर नहीं है
बल्कि प्रसन्न, स्वस्थ, सामान्य और संतुष्ट है
या कि ऐसा दिखता है

वो गरीबी को देखते हैं और हँसते हैं
वो बीमारी को देखते हैं और हँसते हैं
ये सब देखते हैं और हँसते हैं
वो इस पर भी हँसते हैं
सिर्फ़ इसके बावजूद ही नहीं
या फ़िर इसे देखते हैं
और नहीं देखते
क्योंकि देखना उनकी हँसी में
खलल डाल सकता है
वो तब नहीं हँसते जब उनके साथ ऐसा होता है
लेकिन हँसना फ़िर चालू हो जाता है
जब उनके साथ नहीं होता

अगर वो ऐसे हैं
तो उनका जीवन खुशहाल हो सकता है
अगर नहीं हैं तो सज़ा पाएंगे
ऐसी सज़ाएं जो अल्मारियों जैसी हैं
जिनमें कमरे ही कमरे हैं
जिनमें घूमते हुए ज़िंदगी गुज़र जाती है

इस सबके साथ और हँसी
हँसी जो अधिक क्रूर है
शारीरिक यंत्रणा से
हँसी जो अधिक अश्लील है
अश्लीलतम शब्दों से
हँसी जो जान लेने को आमादा कर सकती है
हँसी जो आत्मा का संगीत है
(किस तरह की आत्माएं ऐसा संगीत देती हैं?)
हँसी जो सर्वोत्तम दवा है
हँसी जो ईश्वर का प्रकाश है
यह सुन कर मुझे हँसी आती है

तब क्या हँसी ही उम्मीद है?

मैं उन्हें फिर से देखता हूँ
मुझे एक अलग संभावना दिखती है
एक अलग दुनिया में
नाज़ी सहनशील बन जाते हैं
उत्पीड़क उदार बन जाते हैं
आततायी जनवादी बन जाते हैं
हत्यारों के जीवन में हिंसा नहीं रहती
रिश्वत लेने या देने की कोई ज़रूरत नहीं है
ना ही अत्याचार और शोषण की
उसका कोई मौका भी नहीं है
लोग दूसरों के साथ वही करते हैं
जो वो अपने साथ चाहते हैं

इस अलग दुनिया में भी कुछ लोग हैं
जो वही रहते हैं जो वो पहले थे
क्योंकि वो ऐसे ही पैदा हुए थे
वो अब भी जान लेना और हँसना चाहेंगे
अब भी जान ली जाती देख कर हँसना चाहेंगे
लेकिन ऐसा करने का अवसर नहीं है
यहीं कुछ और लोग भी हैं
जो हत्या नहीं करते थे
जो हत्या होते देख कर हँस नहीं पाते थे
क्योंकि वो भी ऐसे ही पैदा हुए थे
लेकिन वो इस दुनिया में खुश हैं

हँसी अब भी है
जहाँ होनी चाहिए
वहाँ नहीं जहाँ नहीं होनी चाहिए
क्या ऐसी हँसी उम्मीद है?
उम्मीद है कि है
पर मेरी उम्मीद कुछ ज़्यादा है

 

 

ये उम्मीद मेरे लिए नहीं है

मैं नाज़ी जर्मनी में एक यहूदी हूँ
मैं इस्राइल में एक फ़िलिस्तीनी हूँ
हिन्दुस्तानी गाँव में एक दलित
रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका में एक अश्वेत
बाज़ारवादी अर्थव्यस्था में एक साम्यवादी
और साम्यवादी अर्थव्यवस्था में एक ‘प्रतिक्रियावादी’
गोधड़ा-बाद के गुजरात में एक मुसलमान
नवनिर्मित पाकिस्तान में एक हिन्दू
अभिजात लोगों के अस्पताल में एक कोढ़ी

मैं सुंदर लोगों के बीच एक कुरूप हूँ
ताकतवर लोगों में एक कमज़ोर
अमीरों में एक गरीब
किस्मतवालों में एक शापित
स्पेन में एक बाख़-भाषी
सांख्यिकी में एक आउटलायर
आँकडों के हाशिये पर पड़ा एक बिन्दु
अ होपलेस गॉन-केस
जिसके बारे में परेशान होने की
ज़रूरत नहीं होती
जिसका अस्तित्व
खेल को बिगाड़ देता है
या उसमें एक सुखद सादवादी
आयाम जोड़ देता है

मेरे लिए कितनी उम्मीद है?
शायद थोड़ी सी है
अगर मैं स्वीकार कर लूँ
पददलित किया जाना
जमूरा, जोकर, या चमचा बनना
या फ़िर भक्त बनना
मेरे पास कुछ और भी विकल्प हैं
क्योंकि हम एक आज़ाद दुनिया में रहते हैं
मैं अपना मानसिक संतुलन खो सकता हूँ
हिमालय जा सकता हूँ
किसी गुफा में रहने के लिए
(शायद वहाँ तक पहुँच ना पाऊँ
पर वो अलग बात है)
आत्मघाती बमवर्षक बन सकता हूँ
पर वो मैं करना नहीं चाहता

तो मैं जीवन से
वापसी का टिकट तो ले ही सकता हूँ
फ़िर फ़ेवीकोल एक हास्यप्रद विज्ञापन बना सकता है
“मैन कमिटिंग स्वीसाइड” विषय पर
कितना हास्यास्पद था वो दृश्य
जब “कीटनाशी खा कर किसान ने आत्महत्या की”
आप चुटकुले सुना सकते हैं
उस लड़की के बारे में
जो छोटे से तालाब में पड़ी है
जो उसके ही खून से बना है
उसने खुद को गोली मार ली थी
इस दृश्य का इस्तेमाल हो सकता है
एक और विज्ञापन बनाने के लिए
जिससे कुछ और बेचा जा सकता है
अर्थव्यव्स्था संपन्न होगी
खुशहाली बढ़ेगी

मतलब उम्मीद तो है
पर ये मेरे लिए नहीं है

[फेवीकोल ने सही में एक विज्ञापन निकाला था जो कुछ ही वर्ष पूर्व ‘द हिंदू’ में छपा था। शायद अन्य अखबारों में भी छपा हो। इस विज्ञापन में एक इनाम वाली प्रतियागिता का ऐलान था जिसमें “मैन कमिटिंग स्वीसाइड” विषय पर पाठकों से हास्यप्रद विज्ञापन बनाने को कहा गया था।]

 

[2005]

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