अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

October 28, 2008

सांगणिक भाषाविज्ञान

जैसा मैंने पिछली प्रविष्टी (‘पोस्ट’ के लिए यह शब्द इस्तेमाल हो सकता है?) में लिखा था, अगले कुछ हफ्तों में मैं संचय के बारे में लिखने जा रहा हूं।

लेकिन क्योंकि संचय खास तौर पर (आम उपयोक्ताओं के अलावा) सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए बनाया गया है, इस बात को साफ कर देना ठीक रहेगा कि सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान के माने क्या है, या अगर आप इनके माने जानते ही हैं तब भी इनसे मेरा अभिप्राय क्या है। यह दूसरी बात इसलिए कि इन विषयों (सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान) के अर्थ के बारे में आम लोगों में तो तमाम तरह की ग़लतफ़हमियाँ हैं ही, पर इन विषयों के शोधकर्ताओं में भी इनकी परिभाषा पर एक राय नहीं है।

सच तो यह है कि हिंदी जगत में तो अब भी अधिकतर लोग भाषाविज्ञान का अर्थ उस तरह के अध्ययन से लगाते हैं जो पिछली सदी के शुरू में लगाया जाता था। लेकिन बहस की इस दिशा में अभी मैं नहीं जाना चाहूंगा क्योंकि इसके बारे में कहने को इतना अधिक है कि अभी जो उद्देश्य है वो पीछे ही रह जाएगा।

वैसे सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान की परिभाषा या उनकी सीमाओं के बारे में भी कहने को बहुत-बहुत कुछ है, पर फिलहाल थोड़े से ही काम चलाया जा सकता है।

तो छोटे में कहा जाए तो भाषाविज्ञान शोध या अध्ययन का वह विषय है जिसमें किसी एक भाषा के व्याकरण का ही अध्ययन नहीं किया जाता बल्कि नैसर्गिक या मानुषिक (यानी कृत्रिम नहीं) भाषा का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है। अब यह धारणा व्यापक रूप से स्वीकृत है कि मानव मस्तिष्क की संरचना का भाषा की संरचना से सीधा संबंध है और क्योंकि सभी मानवों के मस्तिष्क की संरचना मूलतः एक ही जैसी है, तो सभी नैसर्गिक या मानुषिक भाषाओं में भी सतही लक्षणों को छोड़ कर बाकी सब एक ही जैसा है। इसीलिए, जैसा कि इन विषयों के आधुनिक साहित्य में प्रसिद्ध है, अगर किसी अमरीकी के शिशु को जन्म के तुरंत बाद कोई चीनी परिवार गोद ले ले और वह बच्चा चीन में ही पले तो वह उतनी आसानी से चीनी बोलना सीखेगा जितनी आसानी से कोई चीनी परिवार का बच्चा। ऐसी ढेर सारी और बातें हैं, पर मुख्य बात है कि भाषाविज्ञान नैसर्गिक या मानुषिक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन है।

कम से कम कोशिश तो यही है कि अध्ययन वैज्ञानिक रहे, पर वो वास्तव में रह पाता है या नहीं, यह बहस का विषय है।

अब सांगणिक भाषाविज्ञान पर आएं तो इस विषय में हमारा ध्यान मानवों की बजाय संगणक यानी कंप्यूटर पर आ जाता है, पर पिछली शर्त फिर भी लागू रहती है: नैसर्गिक या मानुषिक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन। अंतर यह है कि हमारा उद्देश्य अब यह हो जाता है कि कंप्यूटर को इस लायक बनाया जा सके कि वो नैसर्गिक या मानुषिक भाषा को समझ सके और उसका प्रयोग कर सके। जाहिर है यह अभी बहुत दूर की बात है और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए क्योंकि अभी भाषाविज्ञान में ही (पिछली सदी की असाधारण उपलब्धियों के बाद भी) वैज्ञानिक ढेर सारी बाधाओं में फंसे हैं।

फिर भी, सांगणिक भाषाविज्ञान में काफ़ी कुछ संभव हो चुका है और काफ़ी कुछ आगे (निकट भविष्य में) संभव हो सकता है। लेकिन इसमें कंप्यूटर का मानव जैसे भाषा बोलना-समझना शामिल नहीं है। जो शामिल है वो हैं ऐसी तकनीक जो दस्तावेजों को ज़्यादा अच्छी तरह ढूंढ सकें, उनका सारांश बना सकें, कुछ हद तक उनका अनुवाद कर सकें आदि।

लेकिन हिंदुस्तानी परिप्रेक्ष्य में परेशानी यह है कि हम अभी इस हालत में भी नहीं पहुंचे हैं कि आसानी से कंप्यूटर का एक बेहतर टाइपराइटर की तरह ही उपयोग कर सकें। इस दिशा में कुछ उपलब्धियाँ हुई हैं, पर अंग्रेज़ी या प्रमुख यूरोपीय भाषाओं की तुलना में हम कहीं भी नहीं हैं। जैसा कि आपमें से अधिकतर जानते ही हैं, यह एक लंबी कहानी है जिसे अभी छोड़ देना ही ठीक है।

पर संचय का विकास इसी परिप्रेक्ष्य में किया गया है, जिसके बारे में आगे बात करेंगे।

Leave a Comment »

No comments yet.

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Create a free website or blog at WordPress.com.

%d bloggers like this: