अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

February 13, 2009

कविता

कविता
शब्दों की महकती चहकती दलदल है

कविता
सिर के ठीक ऊपर सम्मोहक चट्टान है

कविता
बहुत लगन से बुनी गई मज़बूत रस्सी है

कविता
अर्थ और ध्वनि के बादलों की वैद्युत टकराहट है

कविता
घनघोर जंगल है जिसमें खो जाना आसान है

कविता
हहरा कर बहती नदी है जिसमें तैर पाना मुश्किल है

कविता
समझ की सबसे बड़ी दुश्मन है

कविता
समझ का एक और नाम भी है

 

[2009]

1 Comment »

  1. अच्छा लिखा है।

    Comment by परमजीत बाली — February 13, 2009 @ 9:28 pm | Reply


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