अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

February 15, 2009

सत्रहखड़ी

(1)

प्रथम व्रत
तो किया था मैंने ही
रहे वही भी

(2)

नवजीवन
पाने की आस चाहे
क्षत-विक्षत

(3)

नवजीवन
की गढ़ी ये कहानी
बेगानी जो है

(4)

फटे जूते के
महकते मोज़े से
बास ही आस

(5)

तहरी अब
खिचड़ी कहाती है
दुख होता है

(6)

कादा कीचड़
से दूध-दही-घी से
कादा कीचड़

(7)

कलम-तोड़
मौत की वो आहट
दूर नहीं है

(8)

प्रेम पाना है
लाइसेंस मगर
मँहगा जो है

(9)

प्रेम देना है
लेने को कहीं कोई
तैयार नहीं

(10)

आँखों की बात
आगे बढ़ाना काश
संभव होता

(11)

लाल पलाश
नाम पता है मुझे
ग़नीमत है

(12)

लफड़ा हुआ
मालिक तो मालिक
झगड़ा हुआ

(13)

तैरना तो है
पर आता नहीं है
डूबना जो है

(14)

कुछ फूल थे
मृत और जीवित
जो मैंने देखे

(15)

मरो ज़रूर
मगर सलीके से
तो गिनती हो

(16)

कलियुग था
पर अब तो ये है
संजय युग

(17)

बहुत किया
ढेर-सा रह गया
जो करना था

 

[2009]

Leave a Comment »

No comments yet.

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Create a free website or blog at WordPress.com.

%d bloggers like this: