अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

February 26, 2009

काल-कविता

अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
ज़ोर-ज़ोर से
रगड़-रगड़ रगड़-रगड़
इतना करता
शोर मगर शोर मगर
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़

क्यूँ? कुछ हुआ क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।

करना था इसे
जगर-मगर जगर-मगर
करते जाते
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
बोल-तोल से
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़

टुकड़े-टुकड़े
तितर-बितर तितर-बितर
बुरा है लेकिन
हशर-बशर हशर-बशर
हाथों में पड़ गए
छाले मगर छाले मगर
कतर-कतर कतर-कतर

बोलो भाई, पहुँचे क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।

अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
चलती जाती
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़

अब तो बहुत देर हो आई
कुछ और नहीं क्या भाई?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।

बहे जा रही
लाल-लाल
ज़हर-लहर ज़हर-लहर
चले जा रही
इधर-उधर इधर-उधर
मोड़-तोड़ से
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़

बोलो भाई
तुम तक पहुँची क्या?

नहीं, नहीं। अभी नहीं।

 

[2009]

6 Comments »

  1. हिंदी काव्य मंच :: सुन्दर रोचक प्रस्तुति बधाई

    Comment by pradeep manoria — February 26, 2009 @ 10:07 am | Reply

  2. बढ़िया रचना है।बधाई स्वीकारें।

    Comment by परमजीत बली — February 26, 2009 @ 12:18 pm | Reply

  3. […] से वो जो भी अर्थ निकाल सके.   अभी अभी काल कविता पढी तो उस ठक-ठक महाकाव्य की याद आ […]

    Pingback by ठक-ठक महाकाव्य « परिचर्चा — February 27, 2009 @ 6:58 pm | Reply

  4. आपकी तारीफ में एक पोस्ट लिख डाला. आशा है क्षमा करेंगे.

    Comment by कौतुक [Kaotuka] — February 27, 2009 @ 7:01 pm | Reply

    • कौतुक जी,

      तारीफ़ में पोस्ट लिखा जाना तो सम्मान की बात है। तर्क से तो मैं परिचित हूँ (खुद भी दिया है), लेकिन उसके लिए यह नाम (ठक-ठक तर्क) अच्छा है।

      Comment by anileklavya — February 28, 2009 @ 10:48 am | Reply

  5. […] से वो जो भी अर्थ निकाल सके.   अभी अभी काल कविता पढी तो उस ठक-ठक महाकाव्य की याद आ गयी. […]

    Pingback by ठक-ठक महाकाव्य « परिचर्चा — September 13, 2009 @ 2:46 pm | Reply


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