अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

October 21, 2010

कवि परीक्षा

एक बार जब हमने कुछ कविताएँ लिख डाली थीं तो हुआ ये कि एक दिन हमें उनमें से कुछ को दुबारा पढ़ते हुए लगा कि हिन्दी की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं और बहुत सी किताबों में भी जो कविताएँ छपा करती हैं उनसे ये कुछ बुरी तो नहीं हैं। बल्कि हमें ईमानदारी से लगा कि उनमें से अधिकतर से तो अच्छी ही हैं। तो साहब हमने सोचा कि इन्हें खुद ही पढ़-पढ़ कर कैसे चलेगा, क्यों ना इन्हें छपवाने की कोशिश की जाए। फिर क्या था, हमने उनकी एक-एक कॉपी निकाल कर एक फ़ाइल में सजाया जैसे नौकरी का उम्मीदवार अपनी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र सजाता है। इस फ़ाइल को एक अच्छे से बैग में, जो मुफ़्त में कहीं से कभी मिला था, रख कर पहुँच गए एक प्रकाशक के दफ़्तर।

दफ़्तर कोई शानदार नहीं था, लेकिन हिन्दी, वो भी साहित्य, का प्रकाशन दफ़्तर होने के लिहाज से बुरा भी नहीं था। लगता था यहाँ कुछ पाठ्यपुस्तकें या कॉफ़ी टेबल टाइप की किताबें भी छपती होंगी। हो सकता है धार्मिक पुस्तकें भी छपती हों। लगा शायद कविता छपने का कुछ मानदेय भी मिल सकता है। और तो और, एक रिसेप्शनिस्ट भी थी। उसी ने दफ़्तर की हिन्दी-सापेक्ष शान से ध्यान हटा कर पूछा कि क्या चाहिए। गलत मत समझिए, पूछा ऐसे शब्दों में ही था जैसे शब्दों में कोई रिसेप्शनिस्ट पूछती है, पर हमें ऐसे शब्द ठीक से याद नहीं रह पाते।

उद्देश्य बताने पर उसने एक फ़ॉर्म जैसा पकड़ा दिया। पूछा तो बताया कि ये कुछ सवालों की लिस्ट है जिनके जवाब देने के बाद ही संपादक से मिल कर कविता के बारे में बात हो सकती है। सवाल कुछ ऐसे ही थे जैसे किसी झटपट परीक्षा में पूछे जाते हैँ। अब हमने इतनी और ऐसी-ऐसी परीक्षाएँ दी हैं कि कुछ सोचे बिना ही सवाल मुँह से निकल पड़ा कि इस परीक्षा में पास मार्क्स कितने हैं। रिसेप्शनिस्ट ने नाराज़ सा होकर कहा कि पास मार्क्स क्या मतलब, यह साहित्य प्रकाशन का दफ़्तर है। फिर बोली कि वैसे कम से कम तैंतीस प्रतिशत सवालों के जवाब सही होने पर ही कविता छापने की संभावना पर गौर किया जाएगा। जब हमने पूछा कि ये क्या कोई नया इंतज़ाम है, तो बोली कि नहीं ऐसा तो न जाने कब से हो रहा है। कमाल की बात है, हम अपने-आप को साहित्य का बड़ा तगड़ा जानकार समझते थे और हमें ये बात पता ही नहीं थी।

उन सवालों में से जितने याद पड़ते हैं, उन्हें नीचे दिया जाता है। भाषा के बारे में जो ऊपर कहा गया उसे ध्यान में रखा जाए। सवालों का क्रम बिगड़ा हुआ हो सकता है।

  1. आप कला से हैं या विज्ञान से?
  2. आप कोई मंत्री, अफ़सर या कम-से-कम प्रोफ़ेसर हैं?
  3. आपकी कविताओं में से कितनी प्रकृति-प्रेम की कविताएँ है?
  4. आपकी कविताओं में से कितनी प्रेम कविताएँ है?
  5. आपकी कविता से कभी कोई लड़की पटी है?
  6. आपकी कविता पढ़ कर कभी किसी हसीना ने आपको ख़ुतूत लिखे हैं?
  7. माफ़ करें, लेकिन क्या आप खुद हसीना हैं?
  8. आपने कभी याराने-दोस्ताने पर कोई कविता लिखी है?
  9. आपके दोस्तों की संख्या कितनी है?
  10. क्या आपकी कोई प्रेमिका है?
  11. क्या आप शादी-शुदा हैं?
  12. क्या आप अपनी घरवाली से प्रेम करते हैं?
  13. आपकी कविताओं में से कितनी वीर रस की कविताएँ हैं?
  14. आपकी कविताओं को कोई गाता-वाता है?
  15. आपकी कविताओं में से कितनी गाने लायक हैं?
  16. आपके कवि-गुरू कौन थे?
  17. क्या आपने उनकी जितना हो सका सेवा की?
  18. आप कवियों की संगत में रहे हैं?
  19. क्या आपने काफ़ी समय कॉफ़ी हाउस में बहस करते हुए गुज़ारा है?
  20. आप किसी कवि से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  21. आप किसी भी बड़े आदमी से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  22. आप किसी से भी सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  23. आपने जो कविताएँ अभी लिखी हैं, उन्हें ब्लॉग वगैरह पर तो नहीं डाल रखा?
  24. आप ब्लॉग लेखक तो नहीं हैं?
  25. आपने कोई महाकाव्य लिखा है?
  26. आपने कोई खंडकाव्य लिखा है?
  27. आपने कोई लंबी कविता लिखी है?
  28. आपने किसी कवि-सम्मेलन या मुशायरे में कविता पढ़ी है?
  29. आपकी कविता कभी किसी फ़िल्म में शामिल हुई है?
  30. आपकी कविता कभी किसी नाटक में शामिल हुई है?
  31. आपको कविता लिखने के लिए कभी कोई फेलोशिप आदि मिली है?
  32. आप हिन्दी साहित्य के किसी गुट के सधे हुए सदस्य हैं?
  33. अगर हम आपकी कविताओं का संग्रह छाप दें तो क्या आप उसकी एक हज़ार या अधिक प्रतियाँ खरीदने के लिए तैयार हैं?
  34. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप अपने कविता संग्रह को कहीं पाठ्यपुस्तक बनवा सकें?
  35. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकें?
  36. क्या आप खुद हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकते हैं?
  37. क्या आप धार्मिक कविताएँ लिखते हैं?
  38. क्या आप राष्ट्रवादी कविताएँ लिखते हैं?
  39. क्या आपकी कविताओं की राजनीति पाठकों के किसी खास समूह को एक साथ आकर्षित कर सकती है?
  40. क्या आपकी कविताएँ किसी प्रतिष्ठित परंपरा की हैं?
  41. क्या आप कविता की किसी नई परंपरा के प्रवर्तन का दावा करते हैं?
  42. क्या आप समझते हैं कि आपके जैसी कविताएँ आजकल फ़ैशन में हैं?
  43. क्या आपकी कविताएँ पहले कहीं छपी हैं?
  44. आपके ही नाम वाला कोई कवि पहले से तो मौजूद नहीं है?
  45. आप पहले से दूसरों की कविताओं के अनुवादक तो नहीं हैं?

इतना तो हमें मालूम है कि नौकरी के उम्मीदवार को, खास तौर से अगर वो नया हो, अक्सर कहाँ पता होता है कि उसकी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र किसी खास काम के नहीं हैं। उनकी ज़रूरत सिर्फ़ उम्मीदवारों (कैसा बढ़िया शब्द है!) की भीड़ का आकार नियंत्रण में रखने के लिए होती है। पर यहाँ तो पता चला कि मामले का प्रमाणपत्र तक पहुँचना ही दूर की बात है।

अपन तो चुपके से भाग आए वहाँ से। बेस्ती हो जाती। आज तक कभी डबल ज़ीरो नहीं आया।

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