अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

March 6, 2012

खा गया!

Filed under: Uncategorized — anileklavya @ 9:08 pm

खा गया! खा गया! खा गया!

 

कौन खा गया? नेता खा गया क्या?

 

खा गया! खा गया! खा गया!

 

कौन खा गया भई? बड़ा अफ़सर खा गया?

 

खा गया! खा गया! खा गया!

 

अरे बताओ तो कौन खा गया? करोड़पति?

 

अरे नहीं यार! वो ही वाला खा गया!

 

मतलब कौन? अरबपति खा गया?

 

तुम क्यों इन बिचारों के पीछे पड़े रहते हो?

 

तो बता भी दो कि कौन खा गया

 

वही मरियल डेढ़ पसली का कंगाल खा गया!

 

अच्छा ये बताओ कि क्या खा गया?

 

कुछ मत पूछो भई! बड़ी बुरी बात है

 

अरे बता भी दो यार जब इतना बताया है

 

 

क्या बताएँ! बताते हुए भी शर्म आती है

 

 

पहले तो बड़ी मुश्किल से कमाया कुछ पैसा
वो भी बुढ़ापे में आकर, इतना तो बेशरम है
अभी गिनती भर दिन हुए नहीं कमाते-कमाते
इधर-उधर बिना-बात बेहिसाब पैसा बहा गया

 

ऊपर से अपने ही घर में, अपने ही हाथ से
बनाए हुए बासी चावल में मिला के बासी दाल
सिर्फ़ दो टाइम का खाना, चार छोड़ो, पाँच छोड़ो
छः-छः टाइम तक खा गया! खा गया! खा गया!

 

***

और खरबपति का क्या हुआ?

 

ये अच्छा याद दिलाया तुमने!
कुछ मूड सुधरेगा इसी बात से
अरे भई खरबपति साहब के यहाँ

 

अभी तक पता ही नहीं तुम्हें?

 

एक सुंदर सा खरबपति बेटा हुआ है!
तभी तो प्रसाद लाने भेजा था मुझे!
पर धत्तेरे की! इतनी कोशिश कर ली
इस मरियल से ध्यान ही नहीं हटता!

 

आजकल तो बस यही बजता रहता है

खा गया! खा गया! खा गया!

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