अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

April 8, 2015

शिकार की इजाज़त

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जंगली जानवर तो
सब खतम हो गए
खूब शिकार खेला
हज़ारों साल खेला

पहले खेला खाने के लिए
फिर खेला मज़े के लिए
इतना मज़ा आया
इतना मज़ा आया
कि सौ दो सौ साल में ही
सारे जानवर निपटा दिए

और जंगल भी सब काट डाले
उसका भी अपना मज़ा था

मगर क्या करें यार
शिकार की तलब तो
अब भी वैसे ही लगती है
पर इजाज़त अब ज़रा
मुश्किल से मिलती है

लेकिन जब मिल जाती है
तो चूकते हरगिज़ नहीं हैं

पर जैसा ऊपर कहा जा चुका है
जानवर तो सब खतम हो गए
पालतू को मारने में मज़ा नहीं है
तो बचा बस अब आदमी ही है

(मिसाल पालतू आदमी से नहीं है)

उसी का शिकार करना पड़ता है
यानी आदमी का जो पालतू नहीं हो
इजाज़त चाहे मुश्किल से मिलती हो
पर उसका मज़ा ज़बरदस्त है
जिसने किया है वही जानता है
पर लार दूसके भी टपकाते हैं

आदमियों, माने इंसानों की
कोई कमी भी नहीं है
एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं
निपटा तो सकते नहीं
पर टपका तो सकते हैं

थोड़ा माहौल बनाना पड़ता है
कभी-कभी तो शिकार को
मुठभेड़ भी दिखाना पड़ता है

एक बार आदम-खून लग जाए
तो छूटने का नाम नहीं लेता
और छोड़ना चाहता भी कौन है

मुश्किल घूम-फिर के एक वही है
इजाज़त ज़रा मुश्किल से मिलती है
और शिकार के बाद कभी-कभी तो
सिरफिरों की गालियाँ सुननी पड़ती हैं

पर भौंकते कुत्तों की परवा किसे है

हम तो भई खेलते हैं
गर्व से खेलते हैं
और खेलते ही रहेंगे

खूब खेल चुके हैं अब तक

छप्पन नहीं साहब
छप्पन हज़ार, कि लाख, कि करोड़
कौन जाने, गिनती थोड़े ही रखते हैं

कभी शहर में, कभी गाँव में
कभी रेगिस्तान में, कभी पहाड़ पर
कभी वाहन के भीतर, कभी वाहन पर
दोपहर को, शाम को, मुफ़्ती में, वर्दी में
काले का, गोरे का, भूरे का, पीले का
इस धर्म वाले का, उस धर्म वाले का
(धार्मिक शिकार का मज़ा अलग ही है)
कभी दिन में, तो कभी अंधेरे में
कभी इमारत के भीतर, कभी बाहर
कभी समंदर पर, कभी जंगल में

जंगल में शिकार: वाह भई वाह
उसकी कोई बराबरी है ही नहीं
समंदर से भी नहीं, किसी से नहीं
(वैसे समंदर सब को नसीब भी कहाँ है)
पुराने दिनों की याद आ जाती है

आदमी-जानवर का अंतर मिट जाता है
बराबरी का बोलबाला, बुरे का मुँह काला

***

बिल्कुल ग़लत कह रहे हो यार
हम शिकार करते ही नहीं हैं
हम सिर्फ़ तो बलि चढ़ाते हैं
जैसे पहले चढा करती थी
वैसे ही अब भी चढ़ाते हैं

पर कुछ बात तुम्हारी सही है
इजाज़त ज़रा मुश्किल से मिलती है
और बराबरी चाहे जाए भाड़ में
पर बुरे का मुँह ज़रूर काला

[8 अप्रैल, 2015]

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