अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

February 20, 2009

बनना काका हाथरसी

हमें गुमान कि बन सकते
निराला मुक्तिबोध हम भी
उनका कहना तुम बन सकते
बहुत हुआ तो काका हाथरसी

इस सोच से शुरू में
हमें थोड़ी शर्म-सी आती
लेकिन फिर हमारी आत्मा
हमें ये याद दिलाती
कि काका का काम था हँसाना
नुकसान किसी को ना पहुँचाना

और काका के पाठक तो
अब भी हैं दसियों हज़ार
निराला मुक्तिबोध को
जानते पढ़ते कुल दो-चार

काका ने तो बहुतों का
दिल खुश कर दिया
निराला मुक्तिबोध ने
किसी का क्या कल्लिया

पर लाख टके की बात
तो सीधी-सी है ये
कि कसाव अबसदाबादी
से तो हर हाल में बेहतर हैं
अपने बुढ़ऊ काका हाथरसी

एक बस छोटी सी
दिक़्क़त है यही
किसी काकी के बिना
कैसे होगा बनना
कोई काका हाथरसी

 

[2009]

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