अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

March 17, 2009

पेट की चीख़

प्रतिक्षण प्रतीक्षा का प्रहार
साहबों के गले में फूलों का हार
बासी खिचड़ी और अधसड़ा अचार
प्यास से गठबंधित पेय
और भूख से हठबंधित आहार
चैन की नींद के फालूदे का जलता स्वाद

तृप्त शरीरों और तरोताज़ा चेहरों की गुफ़्तगू
नहा कर नये कपड़े पहने शब्दों का
मंजे हुए दांतों, घिसी हुई जीभों और धुले-पुंछे होंठों से लेकर
तौलिये से रगड़कर साफ़ किए हुए कानों तक
कुशल यातायात प्रणाली के तहत आवागमन

पाचन तंत्र के रसों से घायल आमाशय
और सूखी-जली आँतों का घुटता हुआ दम
नींद की कमी से तिलमिलाते मस्तिष्क का
गले से होकर उतरता ही जाता गुस्सा

पर मानवी सभ्यता के मंदिर में भी गूंजता
और बाकी सभी शब्दों को ढक लेता हुआ
एक आदिम, बल्कि पाशविक उद्गम का,
लेकिन एकदम सभ्य सुसंस्कृत सवाल —
मेरे पेट की चीख़ सुनी तो नहीं किसी ने?

[2009]

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