अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

January 9, 2011

नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

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December 25, 2010

Property Rights on Tragedies

Looking into a hypothetical future, let us suppose the (to be) richer countries of Africa were, like the richer countries of Europe, form a union as powerful and influential in World Politics as the present EU. While, as seems likely, India still retains caste based structure of its society. In this world, some politician in India professing to represent the lower castes makes a statement to the effect that India’s higher caste dominated parties discriminate against the lower castes, quite like the white colonialists in Africa against the black skinned people.

Should one expect the African Union to react sharply against this? Whether one should or not, one might have to, if one goes by yet another bizarre event in a world that once again seems to going totally mad.

There has been a strange tussle going on between a certain senior politician of the Congress party in India and the right wing Hindu conglomerate that goes by the name of Rashtriya Swayamsevak Sangh (National Volunteers’ Union) or the RSS. The Congress politician in question is as good or bad as politicians with a relatively better reputations go in India. The RSS is an organization directly connected to the party (BJP) that was in power at the central government a few years ago and still is in many states of India. The RSS has been the subject of numerous studies by scholars (Indian as well as Foreign) and everyone who knows something about it knows that the right wing conglomerate has always had more than a soft spot for Hitler, Mussolini and the Nazis. Therefore, it is quite common in India to find one of its critics (and that of its various offshoots) mentioning the Nazi connection. It might be that sometimes it is overdone, but there is no doubt that in order to understand the nature of the ideology and the politics of this massive but amorphous organization, whose history goes back to a time long before independence, you have to know and understand their admiration for the Nazis and the Fascists generally.

The tussle that I mentioned involves the death of one of the police officers during the Mumbai terror attacks (26/11, as they call it). The accusation made by the said politician is that some Hindu terrorist outfits (relatively new kids on the block as far shooting and bombing kind of terrorism by non-state actors is concerned) were responsible for the death of this officer.

This tussle has been going on for some time now. But what concerns us here is that during this tussle came a statement from the Congress politician that BJP kills Muslims in the name of nationalism, like the Nazis. And that their hatred towards the Muslims is comparable to that of the Nazis towards the Jews. On strictly objective grounds you might say that this is not hundred percent accurate. However, notice that the word used is ‘comparable’, not ‘equivalent’. But, if you want, you can also verify for yourself that there is a significant amount of truth in this statement. Again note that I mean the comparison with the Nazis, not the death of the police officer, about which I can’t say anything.

You can also verify for yourself that during the last two decades (at least) the ideological difference between the Congress party and the BJP (or its earlier avatar) has narrowed down so much that sometimes it is hard to make out which is which. Still, since they are the two major parties and they have to fight elections with each other, they have to criticize each other too, sometimes quite severely. Therefore, it is very normal to see such tussles between the two parties or their leaders, though usually they don’t involve something as spectacular as a multi-day televised terror attack. No one takes much notice as this is a part of the electoral routine, except those whose profession requires them to.

But what do you know. Once you have resigned yourself to the idea that strange things happen, you are made to find out that stranger things happen. Thus it is that we find that soon after the most recent Nazi-BJP/RSS comparison, the Israeli government has taken offence at the ‘invocation of the Holocaust’ by the Congress leader to hit out at the Hindutva (i.e., RSS) organizations. To quote:

The Israeli Embassy reacted to this on Monday through a terse, one-sentence statement that it didn’t approve of the massacres of the Jews being used for political sabre-rattling. “In response to the enquiries from the press, the Embassy wishes to stress without entering the political debate that no comparison can be made with the Nazi Holocaust in which six million Jews were massacred solely because they were Jews,” the statement said.

There are several things that one can note here. One is that the Holocaust as a single event was not mentioned. Another is that even if it had been mentioned, there were other victims: the Gypsies (who are in the news as victims again in 2010), the communists, the homosexuals, the handicapped, the Catholics and even German dissenters. Then there were the members of the conquered ‘inferior’ and not so inferior races, killed in huge numbers (even excluding those killed in battles). Yet another is that comparison is not equivalence and that comparison can, should, and has been used since the beginning of civilization to warn (or caution) against the repeat of the equivalent.

The Israeli statement seems to suggest that through some mysterious legal logic, Israeli state now holds copyright over the Holocaust. Not just that, the statement even seems to suggest that Israel holds the rights even over the Nazis, that is, if you want to compare some ideology or some atrocity to those of the Nazis, you have to first check with the Israeli government.

If only we could be sure that this is just an extremely unusual incident of idiocy. One can objectively try to understand this as an example of a process of mythology creation through which a real event has been appropriated by an institution (a religion, or more accurately, a government claiming to represent a religion) and has been entered in some sacred text so that it now comes exclusively in the domain of that institution’s rites and rituals and theology. But there is not much comfort in such an explanation.

There is another explanation, but it has been put forward previously and I will leave it to others or to the reader.

What next? India holding a copyright on the partition massacres? We will have to share it with Pakistan (and Bangladesh too). The EU holding a copyright on the Black Plague? American Indians on ethnic cleansing? Africans on slavery and racism? The EU again on chemical warfare?

It is said that the whole population of the city of Delhi was wiped out several times: as part of what is called Qatl-e-Aam (Universal Murder or Murder at Large). One of those supposed to have ordered a Qatl-e-Aam in Delhi was Nadirshah, one of the so many to invade India. There must be some exaggeration here, that is, there must have been survivors, just as there were in the Holocaust, but it is an historical fact there were general massacres in Delhi ordered by some invaders. Even the language (Hindi-Urdu) carries the residues in the form of expressions like Qatl-e-Aam itself and ‘Nadirshahi hukm’ (Nadirshah’s order).

So perhaps Delhi should get the rights over Universal Murders. Of course, the rights will have to be negotiated with other claimants. They will have to be narrowed down to Universal Murders in a Single City or something like that.

To be fair, on closer reading, the quotation given above says that “In response to the enquiries from the press, the Embassy wishes to stress…” In other words, it is ‘the press’ (presumably Indian – and right-leaning) that seems to have extracted the statement from the Israeli government. Were they playing their own role in invoking the Holocaust for political sabre-rattling on behalf of the party compared to the Nazis? The Israelis were ready to oblige though.

Be that as it may. What I know for sure from my personal – first hand – experience is that if certain people (and they are very large in number) were able to do as they badly want to do, there would be massacres in India on a scale the world has never seen before. And I am not talking about those who are formally known as the ‘terrorists’.

This is just a statement of fact which I make here, typing on this keyboard, without much feeling at this moment.

And I have realized (in the following moment) that it is now (Merry) Christmas.

September 2, 2010

Two Azads and the Crown

Once there was an Azad whose stories we are taught. He was declared by the government of the day to be a wanted terrorist, but was considered a freedom fighter by the people. He was ultimately hunted down with the help of treacherous informers (so we are told by books sponsored by today’s government). He was killed in an encounter with the security forces in a park. That was a real encounter in a real park, even if some details might be contested.

Then there was another Azad who was also declared by the government of the day to be a wanted terrorist. A lot of people of the country considered him to be fighting for them. He too was killed in an encounter by the security forces, except that the encounter this time was a fake encounter, something which we Indians have come to take pride in, so much so that we have films made in honour of (Fake) Encounter Specialists, sometimes by directors belonging to the minority community whose members are much more likely to be the targets of such encounter deaths.

We are, after all, a secular democracy where the Rule of Law is respected.

Another thing common to both the Azads was that they were revolutionary socialists (krantikaris: क्रांतिकारी).

And another difference was that whereas the first Azad was hunted down as part of the declared policy of the government, the second Azad was one of the revolutionaries with whom the government claimed to be planning to conduct a dialog. He was shot to death from point-blank range in cold blood (in the honorable national tradition of fake encounters), apparently after picking him up from a place where he was traveling in connection with the preliminaries of dialogs which were supposed to be held. In other words, unlike with the foreign colonial government, with our own democratic government he was most probably enticed for a dialog and then got murdered in cold blood. The purpose, it seems, was just to show what we can do to people who dare to oppose us. And no one can touch us. So don’t mess with us. Such a thing is also known by another name: assassination.

The stories carried in the colonial media were biased to the extent that they called the first Azad a terrorist, while the stories in the vibrant free media of the our great democracy were almost total fabrications fed by the security forces.

Security? Really? For whom? From whom?

Along with him, another person was killed. He, a freelance journalist, was summarily and secretly executed for being sympathetic to the Maoists, or perhaps just for being found with the second Azad.

Is any strategist talking about the blowback?

What about the things going on in the region that is (as we were taught) India’s crown? Or should we say the Jewel in the Crown?

I apologize for writing this unoriginal and boring piece. I know hardly anyone will be surprised by anything contained in it.

December 18, 2009

Everything You Always Wanted To Say But Were Afraid To

This must be surely on the minds of many ‘highly educated professionals’, but one of them has actually come out and said all this. And not even under the cover of anonymity…

I think that there should be planned elimination of those groups of people who are seen to create problems to the “vision” of India as an good advanced superpower democracy. These irritating problem creators talk nonsense and bring down the image of India by talking about poverty, hunger, human rights etc and counter the good work that the highly educated middle class Indians working in MNCs and abroad do,to propagate the very nice image of India as a posh country with great malls, technology and being generally great.

They should be eliminated as part of an elimination policy and which groups should be eliminated can be determined by polling and asking the good indians who work in the US, the MNCs and other good posh middle class professionals and we are sure to get many nominations of groups that should be completely eliminated .These groups should include the “intelligentsia” who are useless irritants and spoil the name and image of India and of no use compared to the highly educated professionals working in the US and in the MNCs who everyone should listen to because they are the intelligent and good people.

The only slight drawback of this policy is that it can lead to situation where the country will be significantly depopulated and we will be left with noone but the good educated middle class. There would not many people of the lower classes left to admire the goodness and the greatness of India and the highly educated professionals. One way of circumventing this problem is to have along with the program of elimination a program for brainwashing,using mind control techniques etc including psychosurgery so that some people who are the problem can be made to change their opinion of India and the educated middle class indians that they are good , that India is a wonderful country etc.

We should all admire the brave stand. The forthrightness is really like a breath of fresh air.

So when is the pogrom, I mean program, starting? May be it’s already on.

I wonder which category do I fall in.

March 14, 2009

Hait Hitler

We hait Hitler
No, no!
We don’t Hail Hitler
We Hait Hitler

Why?

Are you serious?

For God’s sake!

He looked like Charlie Chaplin
He walked like Charlie Chaplin
He talked like Charlie Chaplin

He even acted like Charlie Chaplin

Why else?

February 14, 2009

गुलाबी कपड़ा

वात्स्यायन
खजुराहो
कोणार्क
विजयनगर

कालिदास
शाकुन्तला

रीति-काल
नायिका-भेद
तंत्र-तांत्रिक

चरस-गांजा

नागा-बाबा

सोमरस
अप्सराएँ
नृत्य
देवी-देवता
देवगुरू
शिव-शक्ति मिलन
सृष्टि का रहस्य

स्वर्ग
सुना है
आर्यावर्त में
एक अच्छी जगह है
अफ़सोस मगर
पहुँच से बाहर है
और दरवाज़े के बाहर
लाशें यहाँ-वहाँ पड़ी हैं
मरियल शरीरों का मजमा है
बीमारों की भारी भीड़ है
और है संस्कृति का उधार लिया
फटा ढोल बजाते
रक्षकों-भक्षकों दंगाइयों का जुलूस
जिनकी पहुँच ओबामा तक फैली है
और जिनकी सोच ओसामा से मिलती है

गुलाबी कपड़ा
उन्हें कुछ याद दिलाने की
एक खीजी हुई
कोशिश हो सकती है

 

[2009]

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