अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

January 9, 2011

नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

April 4, 2010

Ptypho

I had then recently joined the center. As is quite fashionable (it wasn’t when I did my graduation at some other institution), the young members of the center decided to have T-shirts made with the center’s name. The student who took up the responsibility of preparing the design for the T-shirts was earlier associated with the center but had shifted to some other more respectable center.

The design was created, T-shirts were made and they were paid for and worn by almost all the members of the center. The text on them said ‘The Langauge Cookers’ or ‘The Lagnuage Cookers’ (more likely the latter), with the Language part in a very large size.

One day I was returning to the lab, along with a couple of other graduate students. An undergraduate student (most probably from a more respectable center) came from the opposite side and stopped. He stood in front of the one who was wearing that newly made T-shirt. He put his finger on the misspelled text on the T-shirt and said the following in a tone that is used to point out the incredible stupidity of someone:

– You know that this spelling is wrong?

He was from a center not dealing in mere language.

The T-shirt wearer couldn’t say anything because he hadn’t realized that there was a spelling error. I had noticed the error and had thought that the designer of the T-shirt had chosen a smart and humorous way to say something positive about the mission of the center and the discipline. I was too shocked to reply immediately, but I found the words in time:

– It’s deliberate.

Now it was his turn to be dumbstruck.

– It’s deliberate?

– Yeah, of course it’s deliberate.

I couldn’t resist being scornful. He was still dumbstruck.

– But why?

I didn’t have time to formulate a reply because he left soon after that.

I narrated the incident once or twice to others and they seemed to share my feelings.

Well, time passed (as they say), and I came to know that there were many others in the center who had not noticed the spelling error recreated in such a large size. Or they hadn’t thought about it.

Then I found out that the general consensus outside the center was that the designer of the T-shirt (along with others) had great fun at the expense of the whole center and that the typo was indeed deliberate (what else could it be?), but the designer had wanted to say something very different from what I had imagined.

He was a well liked member of the center and later moved to an Ivy League U.S. university. He remained a well liked (albeit former) member.

My head still hurts from thinking about it. But I can’t escape it because every day something reminds me of this, especially in academics.

Do I hear someone saying that there really are some typos in many posts on this blog?

May 29, 2009

Milk as Karma

Someone called someone milk
Milk as noun or milk as verb?
Milk as the subject or milk as the object?
Milk as the karta or milk as the karma?

The answer appears as a vision
Of huge torrents of something
(It could very well be milk
Of, you know, something)
Flowing from one end
Of the Zipf’s Law curve
To the other end

October 28, 2008

सांगणिक भाषाविज्ञान

जैसा मैंने पिछली प्रविष्टी (‘पोस्ट’ के लिए यह शब्द इस्तेमाल हो सकता है?) में लिखा था, अगले कुछ हफ्तों में मैं संचय के बारे में लिखने जा रहा हूं।

लेकिन क्योंकि संचय खास तौर पर (आम उपयोक्ताओं के अलावा) सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए बनाया गया है, इस बात को साफ कर देना ठीक रहेगा कि सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान के माने क्या है, या अगर आप इनके माने जानते ही हैं तब भी इनसे मेरा अभिप्राय क्या है। यह दूसरी बात इसलिए कि इन विषयों (सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान) के अर्थ के बारे में आम लोगों में तो तमाम तरह की ग़लतफ़हमियाँ हैं ही, पर इन विषयों के शोधकर्ताओं में भी इनकी परिभाषा पर एक राय नहीं है।

सच तो यह है कि हिंदी जगत में तो अब भी अधिकतर लोग भाषाविज्ञान का अर्थ उस तरह के अध्ययन से लगाते हैं जो पिछली सदी के शुरू में लगाया जाता था। लेकिन बहस की इस दिशा में अभी मैं नहीं जाना चाहूंगा क्योंकि इसके बारे में कहने को इतना अधिक है कि अभी जो उद्देश्य है वो पीछे ही रह जाएगा।

वैसे सांगणिक भाषाविज्ञान या भाषाविज्ञान की परिभाषा या उनकी सीमाओं के बारे में भी कहने को बहुत-बहुत कुछ है, पर फिलहाल थोड़े से ही काम चलाया जा सकता है।

तो छोटे में कहा जाए तो भाषाविज्ञान शोध या अध्ययन का वह विषय है जिसमें किसी एक भाषा के व्याकरण का ही अध्ययन नहीं किया जाता बल्कि नैसर्गिक या मानुषिक (यानी कृत्रिम नहीं) भाषा का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है। अब यह धारणा व्यापक रूप से स्वीकृत है कि मानव मस्तिष्क की संरचना का भाषा की संरचना से सीधा संबंध है और क्योंकि सभी मानवों के मस्तिष्क की संरचना मूलतः एक ही जैसी है, तो सभी नैसर्गिक या मानुषिक भाषाओं में भी सतही लक्षणों को छोड़ कर बाकी सब एक ही जैसा है। इसीलिए, जैसा कि इन विषयों के आधुनिक साहित्य में प्रसिद्ध है, अगर किसी अमरीकी के शिशु को जन्म के तुरंत बाद कोई चीनी परिवार गोद ले ले और वह बच्चा चीन में ही पले तो वह उतनी आसानी से चीनी बोलना सीखेगा जितनी आसानी से कोई चीनी परिवार का बच्चा। ऐसी ढेर सारी और बातें हैं, पर मुख्य बात है कि भाषाविज्ञान नैसर्गिक या मानुषिक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन है।

कम से कम कोशिश तो यही है कि अध्ययन वैज्ञानिक रहे, पर वो वास्तव में रह पाता है या नहीं, यह बहस का विषय है।

अब सांगणिक भाषाविज्ञान पर आएं तो इस विषय में हमारा ध्यान मानवों की बजाय संगणक यानी कंप्यूटर पर आ जाता है, पर पिछली शर्त फिर भी लागू रहती है: नैसर्गिक या मानुषिक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन। अंतर यह है कि हमारा उद्देश्य अब यह हो जाता है कि कंप्यूटर को इस लायक बनाया जा सके कि वो नैसर्गिक या मानुषिक भाषा को समझ सके और उसका प्रयोग कर सके। जाहिर है यह अभी बहुत दूर की बात है और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए क्योंकि अभी भाषाविज्ञान में ही (पिछली सदी की असाधारण उपलब्धियों के बाद भी) वैज्ञानिक ढेर सारी बाधाओं में फंसे हैं।

फिर भी, सांगणिक भाषाविज्ञान में काफ़ी कुछ संभव हो चुका है और काफ़ी कुछ आगे (निकट भविष्य में) संभव हो सकता है। लेकिन इसमें कंप्यूटर का मानव जैसे भाषा बोलना-समझना शामिल नहीं है। जो शामिल है वो हैं ऐसी तकनीक जो दस्तावेजों को ज़्यादा अच्छी तरह ढूंढ सकें, उनका सारांश बना सकें, कुछ हद तक उनका अनुवाद कर सकें आदि।

लेकिन हिंदुस्तानी परिप्रेक्ष्य में परेशानी यह है कि हम अभी इस हालत में भी नहीं पहुंचे हैं कि आसानी से कंप्यूटर का एक बेहतर टाइपराइटर की तरह ही उपयोग कर सकें। इस दिशा में कुछ उपलब्धियाँ हुई हैं, पर अंग्रेज़ी या प्रमुख यूरोपीय भाषाओं की तुलना में हम कहीं भी नहीं हैं। जैसा कि आपमें से अधिकतर जानते ही हैं, यह एक लंबी कहानी है जिसे अभी छोड़ देना ही ठीक है।

पर संचय का विकास इसी परिप्रेक्ष्य में किया गया है, जिसके बारे में आगे बात करेंगे।

October 26, 2008

संचय का परिचय

पिछली पोस्ट (शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि पोस्ट के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं ढूंढ पा रहा हूं) में मैंने (अंग्रेज़ी में) संचय के नये संस्करण के बारे में लिखा था। मज़े की बात है कि संचय के बारे में मैंने अभी हिंदी में शायद ही कुछ लिखा हो। इस भूल को सुधारने की कोशिश में अब अगले कुछ हफ्तों में संचय के बारे में कुछ लिखने का सोचा है।

तो संचय कौन है? या संचय क्या है?

पहले सवाल का तो जवाब (अमरीकी शब्दावली में) यह है कि संचय एक सिंगल पेरेंट चाइल्ड है जिसे किसी वेलफेयर का लाभ तो नहीं मिल रहा पर जिस पर बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ हैं।

दूसरे सवाल का जवाब यह है कि संचय सांगणिक भाषाविज्ञान (कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स) या भाषाविज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहे शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सांगणिक औजारों का एक मुक्त (मुफ्त भी कह सकते हैं) तथा ओपेन सोर्स संकलन है। पर खास तौर से यह कंप्यूटर पर भारतीय भाषाओं का उपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति के काम आ सकता है। इसकी एक विशेषता है कि इसमें नयी भाषाओं तथा एनकोडिंगों को आसानी से शामिल किया जा सकता है। लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाएं इसमें पहले से ही शामिल हैं और संचय में उनके उपयोग के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम पर आप निर्भर नहीं है, हालांकि अगर ऑपरेटिंग सिस्टम में ऐसी कोई भी भाषा शामिल है तो उस सुविधा का भी आप उपयोग संचय में कर सकते हैं। यही नहीं, संचय का एक ही संस्करण विंडोज़ तथा लिनक्स/यूनिक्स दोनों पर काम करता है, बशर्ते आपने जे. डी. के. (जावा डेवलपमेंट किट) इंस्टॉल कर रखा हो। यहाँ तक कि आपकी भाषा का फोंट भी ऑपरेटिंग सिस्टम में इंस्टॉल होना ज़रूरी नहीं है।

संचय का वर्तमान संस्करण 0.3.0 है। इस संस्करण में पिछले संस्करण से सबसे बड़ा अंतर यह है कि अब एक ही जगह से संचय के सभी औजार इस्तेमाल किए जा सकते हैं, अलग-अलग स्क्रिप्ट का नाम याद रखने की ज़रूरत नहीं है। कुल मिला कर बारह औजार (ऐप्लीकेशंस) शामिल किए गए हैं, जो हैं:

  1. संचय पाठ संपादक (टैक्सट एडिटर)
  2. सारणी संपादक (टेबल एडिटर)
  3. खोज-बदल-निकाल औजार (फाइंड रिप्लेस ऐक्सट्रैक्ट टूल)
  4. शब्द सूची निर्माण औजार (वर्ड लिस्ट बिल्डर)
  5. शब्द सूची विश्लेषण औजार (वर्ड लिस्ट ऐनेलाइज़र ऐंड विज़ुअलाइज़र)
  6. भाषा तथा एनकोडिंग पहचान औजार (लैंग्वेज ऐंड एनकोडिंग आइडेंटिफिकेशन)
  7. वाक्य रचना अभिटिप्पण अंतराफलक (सिन्टैक्टिक ऐनोटेशन इंटरफेस)
  8. समांतर वांगमय अभिटिप्पण अंतराफलक (पैरेलल कोर्पस ऐनोटेशन इंटरफेस)
  9. एन-ग्राम भाषाई प्रतिरूपण (एन-ग्राम लैंग्वेज मॉडेलिंग टूल)
  10. संभाषण वांगमय अभिटिप्पण अंतराफलक (डिस्कोर्स ऐनोटेशन इंटरफेस)
  11. दस्तावेज विभाजक (फाइल स्प्लिटर)
  12. स्वचालित अभिटिप्पण औजार (ऑटोमैटिक ऐनोटेशन टूल)

अगर इनमें से अधिकतर का सिर-पैर ना समझ आ रहा हो तो थोड़ा इंतज़ार करें। आगे इनके बारे में अधिक जानकारी देने की कोशिश रहेगी।

शायद इतना और जोड़ देने में कोई बुराई नहीं है कि संचय पिछले कुछ सालों से इस नाचीज़ के जिद्दी संकल्प का परिणाम है, जिसमें कुछ और लोगों का भी सहयोग रहा है, चाहे थोड़ा-थोड़ा ही। उन सभी लोगों के नाम संचय के वेबस्थल पर जल्दी ही देखे जा सकेंगे। ये लगभग सभी विद्यार्थी हैं (या थे) जिन्होंने मेरे ‘मार्गदर्शन’ में किसी परियोजना – प्रॉजेक्ट – पर काम किया था या कर रहे हैं।

उम्मीद है कि संचय का इससे भी अगला संस्करण कुछ महीने में आ पाएगा और उसमें और भी अधिक औजार तथा सुविधाएं होंगी।

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