अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

April 28, 2011

हक़

कोई मेरे पास आए
साथ चलने के लिए
और मैं उसे भगा दूँ
दुत्कार कर
फटकार कर
सबके सामने
बेइज्जत कर के

तब भी अगर वो ना जाए
तो मैं उसके होने को ही
नज़रअंदाज़ कर के दिखा दूँ

वो बार-बार आता रहे
और मैं बार-बार यही करूँ
तो क्या मुझे हक़ बनता है
उसे दोष देने का
इसलिए कि उसने साथ नहीं दिया
इसलिए कि वो अब साथ नहीं चल रहा
जबकि मेरी खुद की सांठ-गांठ उन्हीं से है
जिनकी यातना और दुत्कार से बचते हुए
वो मेरे पास आया था

साथ चलने के लिए
इसलिए कि किसी और को
यातना और दुत्कार दिए जाने से रोका जा सके

जबकि मुझे यही नहीं पता
कि वो क्या कर रहा है
और क्यों कर रहा है

किसी के सारे रास्ते बंद करके
(दुनिया से ही टिकट कटा लेने को छोड़ कर)
क्या कोई किसी को पाठ पढ़ा सकता है
कि जीवन कैसे जिया जाए
कि नैतिकता के मानदंड क्या हैं?

Advertisements

Blog at WordPress.com.