अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

January 9, 2011

नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

June 8, 2008

Some Political Disclaimers

While reading a rant today against Arundhati Roy (Not again!), I came across a new (balancing) label. Neo-Marxism. The ranter says that she and others like her are neo-Marxist ‘intellectuals’. Since my political views have a lot in common with hers, I couldn’t help thinking that I too could be accused of being a neo-Marxist (‘intellectual’ or not).

The idea offends me. So much so that I have decided to declare in advance what I am not. What I most certainly never was. Or will be. I hope this will save the time of those (if any) who bother to pay attention to me and then may want to rant against me. I hope this would allow them to make better use of their energies.

Just in case.

And these are the things I wasn’t, am not and will not be:

  • I most definitely am not a Marxist, let alone a neo-Marxist (whatever that means).
  • I am, most emphatically, not a communist.
  • If I am not a communist, I couldn’t be a Maoist. I hate Stalin and I rank Mao only a little better than him.
  • Nor could I be any of the other things like Leninist, ‘Trotskyst’, etc.

Not just that. I don’t believe in a sudden (violent or non-violent) and quick revolution that will change the world overnight magically. I am almost sure that there will be no final victory and living happily ever after. There can only be a continuous long struggle which is unlikely to completely end ever. Because there are too many things (abstract and concrete; human, inhuman and non-human) which are too strong to be overcome easily. I am not even sure whether some of them can be overcome. Even to overcome a few of them is not going to be possible through just polite academic discourse and a bit of charity here and bit of social work there.

In other words, a dystopia is very likely (almost certain if we don’t try to keep preventing it continuously) but a Utopia is out of the question.

The fact is, I am not even sure whether I am ‘very left liberal’ as I have written on my Orkut profile (which no one visits, including me).

Sure, I might be a lot of other things which people like the above mentioned ranter might find worthy of attack. Or those who advocate ‘let’s discuss it over dinner and not make a fuss’ even if it’s a matter of thousands of lives (or deaths). The latter variety includes those who claim to be admirers and even followers of Gandhi. As far as my knowledge, intelligence and reasoning goes, Gandhi was a Big Fuss Maker (even if not big enough for many) for any cause that he was active for.

That takes me to another disclaimer. I am not a Gandhian either.

Am I a socialist? Am I a leftist? Am I a liberal?

It all depends on what exactly these terms mean for the person who is asking. They could be used to mean anything.

The other day I read someone’s comment on the Outlook website ranting against ‘communal Congress’ and raving in favour (favor for the dominant party) of ‘secular RSS/BJP’.

Even as a BJP national leader was feeling diminished by Nepal being declared a secular republic.

But I am not going to give out disclaimers about not being a communalist or fundamentalist or anything of the sort. Don’t think it’s necessary.

Am I definitely something? I could be, but I am not much interested in being labeled. I want to do many things. I have been many things. I am many things.

Who the heck cares? And why on earth?

Exactly.

June 1, 2008

Who’s Afraid of Arundhati Roy?

[This is an extended version of a comment posted on the Outlook magazine website in response to an article by Reeta Sinha.]

I couldn’t really understand what exactly is your point (if any). I do get it that you are enraged by the attention that Arundhati Roy is getting (through her ‘attention grabbing devices’). That’s fine with me. It’s true that she is getting a disproportionate amount of attention, just as her ‘one-book-wonder’ has earned a disproportionate amount of money.

Apart from that, I don’t understand what objections you have which made you write such a long piece on a non-issue. Are you objecting to some particular stand taken by her? To some particular protest she has been involved in?

Or are you just saying that all that she has been arguing for is wrong and that all her ’causes’ are unworthy of support? Or that the causes may be alright but her arguments are wrong?

Frankly, I am not able to get any clue about the answers to these questions from your lengthy tirade against Arundhati Roy, the celebrity.

Do you actually have any stand about any of those causes? Or do you believe they should be left to the experts?

I will tell you my opinion. Of course, what she is saying is not very original in terms of the content. It’s not meant to be original. The purpose of (explicitly) political writing is not to be original, but to effectively argue about some cause or some issue or even about the world in general. Effectively enough for people to pay attention. This means originality in terms of style, at least.

Now, even though you seem to be enraged by the attention she is getting (people interviewing her about herself), you seem to be suggesting that people are actually not paying attention to her, i.e., to what she is saying about the causes and the issues. Is that really so? I don’t think so. Yes, more people are paying attention to the members of the RSS family than to her. In fact, more people are paying attention to Narendra Modi than to her, but then the very nature of what she talks about is such that no one usually wants to listen to those things. Because it can make you uncomfortable and disturbed. It can even shake your very foundations, brainwashed as you may be by the whole system of manufactured consent.

Those people in Nepal who have been brought up on the culture of devotion to the King are still not able to accept the fact that monarchy is a bad idea. Devotion to the monarchy may be at the root of their philosophy of life. They are not going to be convinced easily. Perhaps some will never be. Till they die. But their children (or grandchildren) will have no problem in getting convinced.

So, even if, in absolute terms, not many may be paying attention to her political writing, in relative terms, a large number of people are paying attention to her. And people are not just paying attention to *her*, they are actually paying attention to the causes she is talking about. She has managed to convince some people. Not you, perhaps, but some people. And you may not think so, but a very large number of activists, including those who are scholars of the highest repute and the highest order, do believe that her arguments are convincing and persuasive. You are entitled to your opinion, but then so am I. And so are those who agree with her. And by any standards, the quality of people who agree with her is, on the whole, much higher than those who don’t. You can find the details about this claim if you do your own research (without leaving it to an expert) on her, and on the people I am talking about.

And also about the problems she is talking about.

Why don’t you take your own advice? Ignore the person and focus on the cause. That is, if you think there is a cause. I could have said more about this had you shown any interest in any cause while writing your piece and given some indication of where you stand. For example, what is your position on the War on Terror? Or on the Big Dams? Or on nuclear weapons? Or on Fascism? Or on globalization? Or on Salva Judum? The only hint I can get from your article is that you don’t think any of these issues are important enough for anyone to ‘shout from the rooftop’, as Arundhati Roy described her attempts. Like so many others, you perhaps don’t mind people shouting from the rooftop about safe issues (or non-issues), which doesn’t shake anyone’s foundations.

To make clear why I am writing this, I will repeat again. Ignore the person if you don’t like her talking about herself. Instead focus on the issue or the cause. It is possible, you know.

To me, it doesn’t matter much whether she likes being called an activist or not. Or a writer-activist or not, for that matter. To me, what matters is whether what she is saying about the Big Dams or about corporatization (in the name of globalization) or about Fascism has any validity or not.

Yes, she does get hyperbolic sometimes, but then no one is perfect.

You can avoid hyperbole completely by being a loyal obedient orderly, for example. But I would have no respect for her if she followed this course.

I prefer Kabir (who did use hyperboles quite a lot) to Birbal or Tenali Rama (who also used hyperboles, but in a very safe way).

I like Ramachandra Guha’s writings, but I like P. Sainath’s writings more. But some might say that Sainath also gets hyperbolic. Some might even say that he is glorifying suicides. I know what is the problem with such people.

Literary writing, fictional or non-fictional, explicitly political or implicitly political (there is no such thing as non-political), is not (fortunately) dictated by what teachers of English composition say.

Ever heard of James Joyce? Samuel Beckett? Kafka? Gabriel Garcia Marques? Salman Rushdie?

Pablo Neruda? He was a big celebrity too.

Shakespeare? He is so full of attention grabbing devices. And all his devices have been adopted into the English language. Did your English composition teacher tell you this?

Arrogance! Arrogance!

What about ignorance?

More importantly, what about willful ignorance?

November 10, 2007

A Joycean Blasphemy

I wrote:

I am buried, right now. Under deadlines.

That was just a bit Joycean.

This one is more Joycean:

I am buried. Right. Now. And-er dead. Lines.

(Actually, there is also a touch of Arundhati Roy here.)

I can’t help imagining how a sub-ed would react to this: coming from a nobody. Not even a native speaker of the Global Language.

Blasphemy!

(The rant and the rave are yet to follow. They will come. I promise.)

(प्राण जाएं पर वचन न जाए)

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