अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

January 9, 2011

नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

June 4, 2010

Shooting Oneself in the Foot

A few years ago I had received some feedback from someone about a research paper that I was going to submit to a major conference. Paraphrasing the feedback (repeating the exact words, even with the reference, will be copying: won’t it?), I was told that there was something that I had put in the paper, which, if I insisted on retaining, might make the reviewer look at my paper in a negative light. So, if I didn’t remove that part, I would be shooting myself in the foot.

This is beside the point, but I thought what I had added was correct and so I retained it. The paper was rejected, but I would like to believe that the reason for rejection was not that I had shot myself in the foot.

Getting back to the point, this is an expression that I have come across innumerable times, mostly directed at others, but sometimes directed at me. As a person who claims to be a writer, translator as well as a researcher in a language related discipline (among other things), I can’t help obsessing about how such expressions are used and what they mean, what they show and what they hide.

But I am not interested in writing an academic paper about that. So I write something here. And you are not supposed to review this piece when I submit the next Computational Linguistics paper which might come to you for review. (See the comment functionality below?).

Recently, Chomsky used this expression in a speech, saying ‘those who are being harmed are shooting themselves in the foot’. Now, most of the time that I have come across this expression, I have thought it was being used cynically to show something which wasn’t there and to hide something that was there. Or for some other questionable purposes. However, the people using this expression were mostly respectable well meaning people. Most probably they hadn’t thought about this expression in the way that I had done. May be because if they were to do it, they would be shooting themselves in the foot.

But when Chomsky uses this expression, I can’t but believe that he is using it to mean something sensible, not cynical (if this last part looks strange to you, look up the meanings and histories of these two words, especially the second one).

I do believe that what Chomsky said was basically correct. That is, there are some people who are being harmed and they are indeed shooting themselves in the foot (I am not sure whether I am one of them or not).

The reason I am writing this is that I also believe (based on evidence, not on faith) that such people are (relatively) so few that ridiculing them or offering them advice is hardly going to matter. I must add here that Chomsky did actually caution against ridiculing such people (who have realized that they are being systematically harmed). He only expressed his disappointment that instead of doing something to stop this systematic harming, they are shooting themselves in the foot.

You see, there are also people who are being harmed and are shooting themselves in the head (or ‘consuming pesticide’). You might say that they belong to the same category because the expression is metaphorically wide enough to cover them. That might be true. But then there are also a far larger number of people who are being harmed and they are doing something very different.

They are not shooting themselves in the foot (or in the head). They are shooting others (who are also being harmed) in the foot*. Often they are also shooting others (who are also being harmed) in the head. Sometimes they are doing it for a few extra peanuts, sometimes just for the fun of it and sometimes because they have been led to believe that these targets are their enemies (or the enemies of the nation, or the enemies of the society, or of the religion, or of the community etc.). And since doing it openly is a bit problematic (not cool anymore, baby!), they often have to make it appear as if their target shot himself in the foot (or in the head), whether deliberately or accidentally.

* Perhaps they are programmed in Concurrent Euclid.

So, my take on the matter is that we should be talking about people who are being harmed and who are (literally or metaphorically) shooting others who are also being harmed, whether in the foot or in the head. Because without them, the whole shooting machinery probably won’t be able to operate. In fact, to visualize a grisly scenario, if all such people stopped shooting others (who are being harmed) and started only to shoot themselves in the foot, even then the shooting machinery will probably become dysfunctional. Fortunately, most of the people will not be interested in shooting themselves in the foot (or in the head) if they are just able to find any feasible alternative. Unfortunately, no one from above can tell a person what such an alternative means in practical terms in that person’s circumstances and it’s very hard to find it out for oneself. It’s very hard to even be sure that such an alternative exists. If it does, it’s very hard to translate it into any meaningful action. Compared to a a few decades earlier, it is infinitely harder now, given the extraordinary consolidation of the global power structure (going far beyond what Foucault had studied up to his time), to a great extent due to the techno-administrative ‘advances’ (mostly in the name of security).

There are, surely, people who are being harmed but are not shooting others (being harmed or not being harmed). I won’t say anything about them right now.

(To academic busybodies and surface-style junkies: don’t bother to count the number of times the said expression has been used in this short piece: it has been done very deliberately. Perhaps the author was trying to shoot …).

 

 

For having read the above, here is a bonus link: Fascism then. Fascism now?

May 11, 2009

Useless Fellas

A Skeletal Figure (SF), surely aged above seventy, wearing kurta and trousers, enters a large room where a meeting of academics is being held. The lower end of the back of the kurta is curled so much that it can make you recall the tail of an irritated chameleon. His hair is grey, as is his thin beard. Both look very ungainly. Giggles and other varieties of laughter can be heard at his entry. Some of it comes from the few students doing the duties, but most of it is from the academics. Most seem to know him, but none seem to be friendly. He seems even less friendly. In fact, he seems enraged. Yes, he is. And here he goes, as seems to be his habit:

SF: You useless fellas! You intellectual rowdies! You academic rascals! You dreamers of Turing Award! Have you ever tried to find out who Turing was? Do you know what kind of a person he was? Have you tried to know what happened to him? What was done to him?

More giggles. Some faces smile as at a likable senile.

SF: You worthless key hitters! You lazy brained paper fillers! Have you heard of Chomsky? Have you ever read a single book on libertarian socialism?

Giggles continue, but many are back to their business, now ignoring the intrusion.

SF: If you can’t do anything else, at least go and read Government in the Future and try to find some fault with it. If you can’t read, go and get the audio from the Internet. But don’t waste the bandwidth. Try first on the LAN.

Rushes out. Feelings of relief.

April 19, 2008

हिन्दी ज़ेडनेट – नये अनुवाद (1)

तो आखिर मैंने हिन्दी ज़ेडनेट के लिए तीन और अनुवाद पूरे कर ही दिए। इतना समय लगने का एक कारण यह था (इसके अलावा कि मेरी उम्मीद के विपरीत और कोई अभी तक इस काम में शामिल होने के लिए आगे नहीं आया है) कि एक लेख काफ़ी लंबा था और उसमें दो कविताओं के उद्धरण थे, जिनमें से एक शायद दुनिया की सबसे अधिक पढ़ी गई कविताओं में से एक है।

उम्मीद है कविता अनुवाद के बाद भी कविता जैसी ही लगेगी।

नये अनुवाद ये हैं:

  • ग़ैर-टिकाऊ अविकास: नोम चॉम्स्की
  • कला, सच और राजनीति: हैरॉल्ड पिंटर
  • सभ्यताओं का टकराव: नोम चॉम्स्की

और हाँ, ज़ेडनेट की साइट पूरी तरह बदली जा रही है, परिणामतः हिन्दी ज़ेडनेट भी यहाँ से अब यहाँ आ गया है।

और यह भी कि कुल अनुवादों की संख्या अब एक दहाई यानी दो अंकों तक पहुंच गई है।

तीन अंकों तक अकेले पहुंचाना मुश्किल होगा, फिर भी…

March 28, 2008

Chomsky at His Best

I have read quite a lot of Chomsky. And here I mean his non-Linguistic writings. But today I found the transcript of an answer that he gave after a lecture on 5th November 2001 in Delhi. It’s Chomsky at his best.

Within one answer to a question about the idea of Clash of Civilizations, he has compressed almost everything that one needs to know to understand how the world works. Even though I am very much familiar with his ideas, it was a treat to read this transcript.

I can’t resist the temptation to just quote him wholesale in this post. It’s not a very long article, so it can be read quite quickly. If you think something that he is saying is wrong, you can go ahead and verify it. He has written about the details elsewhere.

As there is no need for me to add or explain, I will just quote. I hope I am not infringing on anyone’s IPR. If I am, I will withdraw the quote. But I would hate to do that.

Here he is:

Remember the context of Huntington’s thesis, the context in which it was put forth. This was after the end of the Cold War. For fifty years, both the US and the Soviet Union had used the pretext of the Cold War as a justification for any atrocities that they wanted to carry out. So if the Russians wanted to send tanks to East Berlin, that was because of the Cold War. And if the US wanted to invade South Vietnam and wipe out Indo-China, that was because of the Cold War. If you look over the history of this period, the pretext had nothing to do with the reasons. The reasons for the atrocities were based in domestic power interests, but the Cold War gave an excuse. Whatever the atrocity carried out, you could say it’s defence against the other side.

After the collapse of the Soviet Union, the pretext is gone. The policies remain the same, with slight changes in tactics, but you need a new pretext. And in fact there’s been a search for pretexts for quite a long time. Actually, it started twenty years ago. When the Reagan Administration came in, it was already pretty clear that appeal to the pretext of the Russian threat was not going to work for very long. So they came into office saying that the focus of their foreign policy would be to combat the plague of international terrorism.

That was twenty years ago. There’s nothing new about this. We have to defend ourselves from other terrorists. And they proceeded to react to that plague by creating the most extraordinary international terrorist network in the world, which carried out massive terror in Central America and Southern Africa and all over the place. In fact, it was so extreme that its actions were even condemned by the World Court and Security Council. With 1989 coming, you needed some new pretexts. This was very explicit. Remember, one of the tasks of intellectuals, the solemn task, is to prevent people from understanding what’s going on. And in order to fulfil that task, you have to ignore the government documentation, for example, which tells you exactly what’s going on. This is a case in point.

Just to give you one illustration. Every year the White House presents to Congress a statement of why we need a huge military budget. Every year it used to be the same: the Russians are coming. The Russians are coming, so we need this monstrous military budget. The question that anyone who is interested in international affairs should have been asking himself or herself is, what are they going to say in March 1990? That was the first presentation to Congress after the Russians clearly weren’t coming – they were not around any more. So that was a very important and extremely interesting document. And of course, it is not mentioned anywhere, because it’s much too interesting. That was March 1990, the first Bush Administration giving its presentation to Congress.

It was exactly the same as every year. We need a huge military budget. We need massive intervention forces, mostly poised at the Middle East. We have to protect what’s called the ‘defence industrial base’ – that’s a euphemism that means high-tech industry. We have to ensure that the public pays the costs of high-tech industry by funnelling it through the military system under the pretext of defence.

So it was exactly the same as before. The only difference was the reasons. It turned out that the reasons we needed all this was not because the Russians were coming, but – I’m quoting – because of the ‘technological sophistication of Third World powers.’ That’s why we need the huge military budget. The massive military forces aimed at the Middle East still have to be aimed there, and here comes an interesting phrase. It says, they have to be aimed at the Middle East where ‘the threat to our interests could not be laid at the Kremlin’s door.’ In other words, sorry, I’ve been lying to you for fifty years, but now the Kremlin isn’t around any more so I’ve got to tell you the truth: ‘The threat to our interests could not be laid at the Kremlin’s door.’

Remember, it couldn’t be laid at Iraq’s door either, because at that time Saddam Hussein was a great friend and ally of the United States. He had already carried out his worst atrocities, like gassing Kurds and everything else, but he remained a fine guy, who hadn’t disobeyed orders yet – the one crime that matters. So nothing could be laid at Iraq’s door, or at the Kremlin’s door.

The real threat, as always, was that the region might take control of its own destiny, including its own resources. And that can’t be tolerated, obviously. So we have to support oppressive states, like Saudi Arabia and others, to make sure that they guarantee that the profits from oil (it’s not so much the oil as the profits from oil) flow to the people who deserve it: rich western energy corporations or the US Treasury Department or Bechtel Construction, and so on. So that’s why we need a huge military budget. Other than that, the story is the same.

What does this have to do with Huntington? Well, he’s a respected intellectual. He can’t say this. He can’t say, look, the method by which the rich run the world is exactly the same as before, and the major confrontation remains what it has always been: small concentrated sectors of wealth and power versus everybody else. You can’t say that. And in fact if you look at those passages on the clash of civilizations, he says that in the future the conflict will not be on economic grounds. So let’s put that out of our minds. You can’t think about rich powers and corporations exploiting people, that can’t be the conflict. It’s got to be something else. So it will be the ‘clash of civilizations’ – the western civilization and Islam and Confucianism.

Well, you can test that. It’s a strange idea, but you can test it. For example, you can test it by asking how the United States, the leader of the western civilization, has reacted to Islamic fundamentalists. Well, the answer is, it’s been their leading supporter. For instance, the most extreme Islamic fundamentalist state in the world at that time was Saudi Arabia. Maybe it has been succeeded by the Taliban, but that’s an offshoot of Saudi Arabian Wahhabism.

Saudi Arabia has been a client of the United States since its origins. And the reason is that it plays the right role. It ensures that the wealth of the region goes to the right people: not people in the slums of Cairo, but people in executive suites in New York. And as long as they do that, Saudi Arabian leaders can treat women as awfully as they want, they can be the most extreme fundamentalists in existence, and they’re just fine. That’s the most extreme fundamentalist state in the world.

What is the biggest Muslim state in the world? Indonesia. And what’s the relation between the United States and Indonesia? Well, actually the United States was hostile to Indonesia until 1965. That’s because Indonesia was part of the nonaligned movement. The United States hated Nehru, despised him in fact, for exactly the same reason. So they despised Indonesia. It was independent. Furthermore, it was a dangerous country because it had one mass-based political party, the PKI, which was a party of the poor, a party of peasants, basically. And it was gaining power through the open democratic system, therefore it had to be stopped.

The US tried to stop it in 1958 by supporting a rebellion. That failed. They then started supporting the Indonesian Army, and in 1965 the army carried out a coup, led by General Suharto. They carried out a huge massacre of hundreds of thousands, maybe a million people (mostly landless peasants), and wiped out the only mass-based party. This led to unrestrained euphoria in the West. The United States, Britain, Australia – it was such a glorious event that they couldn’t control themselves.

The headlines were, ‘A gleam of light in Asia’, ‘A hope where there once was none’, ‘The Indonesian moderates have carried out a boiling bloodbath’. I mean, they didn’t conceal what happened – ‘Staggering mass slaughter’, ‘The greatest event in history’. The CIA compared it to the massacres of Stalin and Hitler, and that was wonderful. And ever since that time, Indonesia became a favoured ally of the United States.

It continued to have one of the bloodiest records in the late twentieth century (mass murder in East Timor, hideous tortures of dissidents, and so on), but it was fine. It was the biggest Islamic state in the world, but it was just fine. Suharto was ‘our kind of guy’, the way Clinton described him when he visited in the mid-nineties. And he stayed a friend of the United States until he made a mistake. He made a mistake by dragging his feet over IMF orders.

After the Asian crash, the IMF imposed very harsh orders, and Suharto didn’t go along the way he was supposed to. And he also lost control of the society. That’s also a mistake. So at that point the Secretary of State, Madeleine Albright, gave him a telephone call, and said literally, ‘We think it’s time for a democratic transition.’ Merely by accident, four hours later he abdicated, but Indonesia remained a US favourite.

These are two of the main Islamic states. What about the extreme Islamic fundamentalist non-state actors, let’s say the Al Qaeda network. Who formed them? They’re the creation of the CIA, British intelligence, Saudi Arabian funding, Egypt and so on. They brought the most extreme radical fundamentalists they could find anywhere, in North Africa or the Middle East, and trained them, armed them, nurtured them to harass the Russians – not to help the Afghans. These guys were carrying out terrorism from the beginning. They assassinated President Saddat twenty years ago. But they were the main groups supported by the US. So, where is the clash of civilizations?

Let’s move a little further. During the 1980s, the United States carried out a major war in Central America. A couple of hundred thousand people were killed, four countries almost destroyed, I mean it was a vast war. Who was the target of that war? Well, one of the main targets was the Catholic Church. The decade of the 1980s began with the assassination of an archbishop. It ended with the assassination of six leading Jesuit intellectuals, including the rector of the main university. They were killed by basically the same people – terrorist forces, organized and armed and trained by the United States.

During that period, plenty of church people were killed. Hundreds of thousands of peasants and poor people also died, as usual, but one of the main targets was the Catholic Church. Why? Well, the Catholic Church had committed a grievous sin in Latin America. For hundreds of years, it had been the church of the rich. That was fine. But in the 1960s, the Latin American bishops adopted what they called a ‘preferential option for the poor.’ At that point they became like this mass-based political party in Indonesia, which was a party of the poor and the peasants and naturally it had to be wiped out. So the Catholic Church had to be smashed.

Coming back to the beginning, just where is the clash of civilizations? I mean, there is a clash alright. There is a clash with those who are adopting the preferential option for the poor no matter who they are. They can be Catholics, they can be Communists, they can be anything else. They can be white, black, green, anything. Western terror is totally ecumenical. It’s not really racist – they’ll kill anybody who takes the wrong stand on the major issues.

But if you’re an intellectual, you can’t say that. Because it’s too obviously true. And you can’t let people understand what is obviously true. You have to create deep theories, that can be understood only if you have a PhD from Harvard or something. So we have a clash of civilizations, and we’re supposed to worship that. But it makes absolutely no sense.

Reminder: This is the the transcript of an answer that Chomsky gave after a lecture on 5th November 2001 in Delhi.

December 8, 2006

हिन्दी में ज़ेडनेट

ZNet/ZMag पर एक बेहतर दुनिया के लिए कोशिश करने वाले लोगों के विचारों और उनकी गतिविधियों के बारे में लेख प्रकाशित होते हैं। हाल ही मैं मैंने ज़ेडनेट के हिन्दी संस्करण की शुरुआत की है। यह शुरुआत केवल पाँच लेखों के अनुवाद से की गई है, पर उम्मीद है और लोग भी साथ देंगे ताकि ज़ेडनेट की सर्वोत्तम सामग्री हिन्दी में उपलब्ध हो सके। आप भी इसमें सहयोग कर सकते हैं।

Create a free website or blog at WordPress.com.