अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

April 28, 2011

हक़

कोई मेरे पास आए
साथ चलने के लिए
और मैं उसे भगा दूँ
दुत्कार कर
फटकार कर
सबके सामने
बेइज्जत कर के

तब भी अगर वो ना जाए
तो मैं उसके होने को ही
नज़रअंदाज़ कर के दिखा दूँ

वो बार-बार आता रहे
और मैं बार-बार यही करूँ
तो क्या मुझे हक़ बनता है
उसे दोष देने का
इसलिए कि उसने साथ नहीं दिया
इसलिए कि वो अब साथ नहीं चल रहा
जबकि मेरी खुद की सांठ-गांठ उन्हीं से है
जिनकी यातना और दुत्कार से बचते हुए
वो मेरे पास आया था

साथ चलने के लिए
इसलिए कि किसी और को
यातना और दुत्कार दिए जाने से रोका जा सके

जबकि मुझे यही नहीं पता
कि वो क्या कर रहा है
और क्यों कर रहा है

किसी के सारे रास्ते बंद करके
(दुनिया से ही टिकट कटा लेने को छोड़ कर)
क्या कोई किसी को पाठ पढ़ा सकता है
कि जीवन कैसे जिया जाए
कि नैतिकता के मानदंड क्या हैं?

March 21, 2011

इंकलाब के पहले

अन्याय हर तरफ फैला है
पूंजी का बोलबाला है
सच का सर्वत्र मुँह काला है

ये हालात तो बदलने ही होंगे
बदलाव के हालात बनाने होंगे

तभी तो इंकलाब आएगा
हर जन अपना हक पाएगा

पर उसके पहले बहुत से काम
जो अभी तक पूरे नहीं हुए
वो सब के सब निपटाने होंगे

वो कोने में जिसे अधमरा करके
बड़े दिनों से डाल रखा है
वो अब भी, हद है आखिर,
कभी-कभार बड़-बड़ किए रहता है

उसे सबक सिखाना होगा
उसके भौंकने को बंद कराना होगा
पहला बड़ा काम तो यही है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

फिर आपस के झगड़े भी तो हैं
तगड़े हैं, एक से एक बढ़ के हैं
एक-दूसरे को सबक सिखाना होगा
एक-दूसरे का भौंकना बंद कराना होगा

दूसरा बड़ा काम यह भी तो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

फिर कुछ डरे सहमे
असुरक्षित लोगों ने
अपनी बुद्धि का
अपने ज्ञान का
और तो और
अपनी प्रतिभा का!
(हद है!, हद है!
कितनी अकड़ है!)
आतंक फैला रखा है
यहीं, इंकलाबियों के बीच!

उनका मटियामेट कर के ही
सच्चे इंकलाबी दम ले सकते हैं
उन्हें अपने साथ लाकर नहीं

एक तीसरा बड़ा काम यह जो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

ऐसे कितने ही काम और हैं
जिन्हें निपटाना है
इंकलाब के पहले

इसी से याद आया
एक काम तो यही है
कि इन कामों में
जो अड़चन पहुँचाए
उसे हड़का-हड़का के
आपसी झगड़े
ज़रा देर को भुला के
मिल-जुल कर
ऊपर पहुँचाया जाए

इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

January 9, 2011

नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

December 25, 2010

Property Rights on Tragedies

Looking into a hypothetical future, let us suppose the (to be) richer countries of Africa were, like the richer countries of Europe, form a union as powerful and influential in World Politics as the present EU. While, as seems likely, India still retains caste based structure of its society. In this world, some politician in India professing to represent the lower castes makes a statement to the effect that India’s higher caste dominated parties discriminate against the lower castes, quite like the white colonialists in Africa against the black skinned people.

Should one expect the African Union to react sharply against this? Whether one should or not, one might have to, if one goes by yet another bizarre event in a world that once again seems to going totally mad.

There has been a strange tussle going on between a certain senior politician of the Congress party in India and the right wing Hindu conglomerate that goes by the name of Rashtriya Swayamsevak Sangh (National Volunteers’ Union) or the RSS. The Congress politician in question is as good or bad as politicians with a relatively better reputations go in India. The RSS is an organization directly connected to the party (BJP) that was in power at the central government a few years ago and still is in many states of India. The RSS has been the subject of numerous studies by scholars (Indian as well as Foreign) and everyone who knows something about it knows that the right wing conglomerate has always had more than a soft spot for Hitler, Mussolini and the Nazis. Therefore, it is quite common in India to find one of its critics (and that of its various offshoots) mentioning the Nazi connection. It might be that sometimes it is overdone, but there is no doubt that in order to understand the nature of the ideology and the politics of this massive but amorphous organization, whose history goes back to a time long before independence, you have to know and understand their admiration for the Nazis and the Fascists generally.

The tussle that I mentioned involves the death of one of the police officers during the Mumbai terror attacks (26/11, as they call it). The accusation made by the said politician is that some Hindu terrorist outfits (relatively new kids on the block as far shooting and bombing kind of terrorism by non-state actors is concerned) were responsible for the death of this officer.

This tussle has been going on for some time now. But what concerns us here is that during this tussle came a statement from the Congress politician that BJP kills Muslims in the name of nationalism, like the Nazis. And that their hatred towards the Muslims is comparable to that of the Nazis towards the Jews. On strictly objective grounds you might say that this is not hundred percent accurate. However, notice that the word used is ‘comparable’, not ‘equivalent’. But, if you want, you can also verify for yourself that there is a significant amount of truth in this statement. Again note that I mean the comparison with the Nazis, not the death of the police officer, about which I can’t say anything.

You can also verify for yourself that during the last two decades (at least) the ideological difference between the Congress party and the BJP (or its earlier avatar) has narrowed down so much that sometimes it is hard to make out which is which. Still, since they are the two major parties and they have to fight elections with each other, they have to criticize each other too, sometimes quite severely. Therefore, it is very normal to see such tussles between the two parties or their leaders, though usually they don’t involve something as spectacular as a multi-day televised terror attack. No one takes much notice as this is a part of the electoral routine, except those whose profession requires them to.

But what do you know. Once you have resigned yourself to the idea that strange things happen, you are made to find out that stranger things happen. Thus it is that we find that soon after the most recent Nazi-BJP/RSS comparison, the Israeli government has taken offence at the ‘invocation of the Holocaust’ by the Congress leader to hit out at the Hindutva (i.e., RSS) organizations. To quote:

The Israeli Embassy reacted to this on Monday through a terse, one-sentence statement that it didn’t approve of the massacres of the Jews being used for political sabre-rattling. “In response to the enquiries from the press, the Embassy wishes to stress without entering the political debate that no comparison can be made with the Nazi Holocaust in which six million Jews were massacred solely because they were Jews,” the statement said.

There are several things that one can note here. One is that the Holocaust as a single event was not mentioned. Another is that even if it had been mentioned, there were other victims: the Gypsies (who are in the news as victims again in 2010), the communists, the homosexuals, the handicapped, the Catholics and even German dissenters. Then there were the members of the conquered ‘inferior’ and not so inferior races, killed in huge numbers (even excluding those killed in battles). Yet another is that comparison is not equivalence and that comparison can, should, and has been used since the beginning of civilization to warn (or caution) against the repeat of the equivalent.

The Israeli statement seems to suggest that through some mysterious legal logic, Israeli state now holds copyright over the Holocaust. Not just that, the statement even seems to suggest that Israel holds the rights even over the Nazis, that is, if you want to compare some ideology or some atrocity to those of the Nazis, you have to first check with the Israeli government.

If only we could be sure that this is just an extremely unusual incident of idiocy. One can objectively try to understand this as an example of a process of mythology creation through which a real event has been appropriated by an institution (a religion, or more accurately, a government claiming to represent a religion) and has been entered in some sacred text so that it now comes exclusively in the domain of that institution’s rites and rituals and theology. But there is not much comfort in such an explanation.

There is another explanation, but it has been put forward previously and I will leave it to others or to the reader.

What next? India holding a copyright on the partition massacres? We will have to share it with Pakistan (and Bangladesh too). The EU holding a copyright on the Black Plague? American Indians on ethnic cleansing? Africans on slavery and racism? The EU again on chemical warfare?

It is said that the whole population of the city of Delhi was wiped out several times: as part of what is called Qatl-e-Aam (Universal Murder or Murder at Large). One of those supposed to have ordered a Qatl-e-Aam in Delhi was Nadirshah, one of the so many to invade India. There must be some exaggeration here, that is, there must have been survivors, just as there were in the Holocaust, but it is an historical fact there were general massacres in Delhi ordered by some invaders. Even the language (Hindi-Urdu) carries the residues in the form of expressions like Qatl-e-Aam itself and ‘Nadirshahi hukm’ (Nadirshah’s order).

So perhaps Delhi should get the rights over Universal Murders. Of course, the rights will have to be negotiated with other claimants. They will have to be narrowed down to Universal Murders in a Single City or something like that.

To be fair, on closer reading, the quotation given above says that “In response to the enquiries from the press, the Embassy wishes to stress…” In other words, it is ‘the press’ (presumably Indian – and right-leaning) that seems to have extracted the statement from the Israeli government. Were they playing their own role in invoking the Holocaust for political sabre-rattling on behalf of the party compared to the Nazis? The Israelis were ready to oblige though.

Be that as it may. What I know for sure from my personal – first hand – experience is that if certain people (and they are very large in number) were able to do as they badly want to do, there would be massacres in India on a scale the world has never seen before. And I am not talking about those who are formally known as the ‘terrorists’.

This is just a statement of fact which I make here, typing on this keyboard, without much feeling at this moment.

And I have realized (in the following moment) that it is now (Merry) Christmas.

October 21, 2010

कवि परीक्षा

एक बार जब हमने कुछ कविताएँ लिख डाली थीं तो हुआ ये कि एक दिन हमें उनमें से कुछ को दुबारा पढ़ते हुए लगा कि हिन्दी की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं और बहुत सी किताबों में भी जो कविताएँ छपा करती हैं उनसे ये कुछ बुरी तो नहीं हैं। बल्कि हमें ईमानदारी से लगा कि उनमें से अधिकतर से तो अच्छी ही हैं। तो साहब हमने सोचा कि इन्हें खुद ही पढ़-पढ़ कर कैसे चलेगा, क्यों ना इन्हें छपवाने की कोशिश की जाए। फिर क्या था, हमने उनकी एक-एक कॉपी निकाल कर एक फ़ाइल में सजाया जैसे नौकरी का उम्मीदवार अपनी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र सजाता है। इस फ़ाइल को एक अच्छे से बैग में, जो मुफ़्त में कहीं से कभी मिला था, रख कर पहुँच गए एक प्रकाशक के दफ़्तर।

दफ़्तर कोई शानदार नहीं था, लेकिन हिन्दी, वो भी साहित्य, का प्रकाशन दफ़्तर होने के लिहाज से बुरा भी नहीं था। लगता था यहाँ कुछ पाठ्यपुस्तकें या कॉफ़ी टेबल टाइप की किताबें भी छपती होंगी। हो सकता है धार्मिक पुस्तकें भी छपती हों। लगा शायद कविता छपने का कुछ मानदेय भी मिल सकता है। और तो और, एक रिसेप्शनिस्ट भी थी। उसी ने दफ़्तर की हिन्दी-सापेक्ष शान से ध्यान हटा कर पूछा कि क्या चाहिए। गलत मत समझिए, पूछा ऐसे शब्दों में ही था जैसे शब्दों में कोई रिसेप्शनिस्ट पूछती है, पर हमें ऐसे शब्द ठीक से याद नहीं रह पाते।

उद्देश्य बताने पर उसने एक फ़ॉर्म जैसा पकड़ा दिया। पूछा तो बताया कि ये कुछ सवालों की लिस्ट है जिनके जवाब देने के बाद ही संपादक से मिल कर कविता के बारे में बात हो सकती है। सवाल कुछ ऐसे ही थे जैसे किसी झटपट परीक्षा में पूछे जाते हैँ। अब हमने इतनी और ऐसी-ऐसी परीक्षाएँ दी हैं कि कुछ सोचे बिना ही सवाल मुँह से निकल पड़ा कि इस परीक्षा में पास मार्क्स कितने हैं। रिसेप्शनिस्ट ने नाराज़ सा होकर कहा कि पास मार्क्स क्या मतलब, यह साहित्य प्रकाशन का दफ़्तर है। फिर बोली कि वैसे कम से कम तैंतीस प्रतिशत सवालों के जवाब सही होने पर ही कविता छापने की संभावना पर गौर किया जाएगा। जब हमने पूछा कि ये क्या कोई नया इंतज़ाम है, तो बोली कि नहीं ऐसा तो न जाने कब से हो रहा है। कमाल की बात है, हम अपने-आप को साहित्य का बड़ा तगड़ा जानकार समझते थे और हमें ये बात पता ही नहीं थी।

उन सवालों में से जितने याद पड़ते हैं, उन्हें नीचे दिया जाता है। भाषा के बारे में जो ऊपर कहा गया उसे ध्यान में रखा जाए। सवालों का क्रम बिगड़ा हुआ हो सकता है।

  1. आप कला से हैं या विज्ञान से?
  2. आप कोई मंत्री, अफ़सर या कम-से-कम प्रोफ़ेसर हैं?
  3. आपकी कविताओं में से कितनी प्रकृति-प्रेम की कविताएँ है?
  4. आपकी कविताओं में से कितनी प्रेम कविताएँ है?
  5. आपकी कविता से कभी कोई लड़की पटी है?
  6. आपकी कविता पढ़ कर कभी किसी हसीना ने आपको ख़ुतूत लिखे हैं?
  7. माफ़ करें, लेकिन क्या आप खुद हसीना हैं?
  8. आपने कभी याराने-दोस्ताने पर कोई कविता लिखी है?
  9. आपके दोस्तों की संख्या कितनी है?
  10. क्या आपकी कोई प्रेमिका है?
  11. क्या आप शादी-शुदा हैं?
  12. क्या आप अपनी घरवाली से प्रेम करते हैं?
  13. आपकी कविताओं में से कितनी वीर रस की कविताएँ हैं?
  14. आपकी कविताओं को कोई गाता-वाता है?
  15. आपकी कविताओं में से कितनी गाने लायक हैं?
  16. आपके कवि-गुरू कौन थे?
  17. क्या आपने उनकी जितना हो सका सेवा की?
  18. आप कवियों की संगत में रहे हैं?
  19. क्या आपने काफ़ी समय कॉफ़ी हाउस में बहस करते हुए गुज़ारा है?
  20. आप किसी कवि से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  21. आप किसी भी बड़े आदमी से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  22. आप किसी से भी सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  23. आपने जो कविताएँ अभी लिखी हैं, उन्हें ब्लॉग वगैरह पर तो नहीं डाल रखा?
  24. आप ब्लॉग लेखक तो नहीं हैं?
  25. आपने कोई महाकाव्य लिखा है?
  26. आपने कोई खंडकाव्य लिखा है?
  27. आपने कोई लंबी कविता लिखी है?
  28. आपने किसी कवि-सम्मेलन या मुशायरे में कविता पढ़ी है?
  29. आपकी कविता कभी किसी फ़िल्म में शामिल हुई है?
  30. आपकी कविता कभी किसी नाटक में शामिल हुई है?
  31. आपको कविता लिखने के लिए कभी कोई फेलोशिप आदि मिली है?
  32. आप हिन्दी साहित्य के किसी गुट के सधे हुए सदस्य हैं?
  33. अगर हम आपकी कविताओं का संग्रह छाप दें तो क्या आप उसकी एक हज़ार या अधिक प्रतियाँ खरीदने के लिए तैयार हैं?
  34. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप अपने कविता संग्रह को कहीं पाठ्यपुस्तक बनवा सकें?
  35. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकें?
  36. क्या आप खुद हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकते हैं?
  37. क्या आप धार्मिक कविताएँ लिखते हैं?
  38. क्या आप राष्ट्रवादी कविताएँ लिखते हैं?
  39. क्या आपकी कविताओं की राजनीति पाठकों के किसी खास समूह को एक साथ आकर्षित कर सकती है?
  40. क्या आपकी कविताएँ किसी प्रतिष्ठित परंपरा की हैं?
  41. क्या आप कविता की किसी नई परंपरा के प्रवर्तन का दावा करते हैं?
  42. क्या आप समझते हैं कि आपके जैसी कविताएँ आजकल फ़ैशन में हैं?
  43. क्या आपकी कविताएँ पहले कहीं छपी हैं?
  44. आपके ही नाम वाला कोई कवि पहले से तो मौजूद नहीं है?
  45. आप पहले से दूसरों की कविताओं के अनुवादक तो नहीं हैं?

इतना तो हमें मालूम है कि नौकरी के उम्मीदवार को, खास तौर से अगर वो नया हो, अक्सर कहाँ पता होता है कि उसकी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र किसी खास काम के नहीं हैं। उनकी ज़रूरत सिर्फ़ उम्मीदवारों (कैसा बढ़िया शब्द है!) की भीड़ का आकार नियंत्रण में रखने के लिए होती है। पर यहाँ तो पता चला कि मामले का प्रमाणपत्र तक पहुँचना ही दूर की बात है।

अपन तो चुपके से भाग आए वहाँ से। बेस्ती हो जाती। आज तक कभी डबल ज़ीरो नहीं आया।

October 14, 2010

खुश हुआ खुश हुआ

[ये श्री अनिल एकलव्य जी के एक विद्वतापूर्ण शोधपरक लेख का खड़ी बोली कविता में अनुवाद है। मूल लेख बिजली के खेल में हुए हार्ड डिस्क क्रैश के कारण खो गया है। उसे रिकवर करने की कोशिश चल रही है। तब तक यही सही।]

जंगल-जंगल पता चला है
धोती पहन के मोगैंबो खिला है
पगड़ी पहन के गब्बर सिंह सजा है

पिछली बार जो लठैतों-डकैतों ने
तोड़ा-फोड़ी और पिटाई की वो याद ही है तुम्हें
तो ये मसला अब बहुत लंबा खिंच गया है
जज साहिबान, अब इसे लॉक किया जाए

अबकी अगर शामत न आई हो
तो समझ से काम लो और चुप बैठो
हमने रियायत कर दी है तुम्हारे साथ
पर लठैत-डकैत अभी संत नहीं हो लिए हैं

ज़रूरत पड़ी तो जो कहा गया था
वही होगा
तलवारें निकल आएंगी म्यान से
और जो भी करेगा विरोध
वो जाएगा जान से

हाँ, ये ठीक है – अबकी कोई शोर नहीं
बड़ा डिग्नीफ़ाइड रिस्पौंस रहा है
लगे रहो, जमे रहो, सीख जाओगे

खुश हुआ, मोगैंबो खुश हुआ
गब्बर सिंह को ये शरीफ़ाना नाच
ब-हु-त पसंद आया
ये परिवार के साथ देखने लायक है

परिवार समझते हो ना?
क्या करें
आजकल के बच्चे परिवार संस्कार
सब भूलते जा रहे हैं

उसके बारे में भी कुछ करेंगे
सर्च एंजिन वालों से भी बात चलाई है
पर फिलहाल तो इस फिल्म को
अगले साल ऑस्कर में भेजेंगे

[कविता में किए इस अनुवाद में घटिया फ़िल्मों का ज़िक्र आने का ऐसा है कि अनुवादक बेचारा खुद एक भयंकर घटिया फ़िल्म में एक ऐक्स्ट्रा है। दुआ कीजिए कि इस नई फ़िल्म को ऑस्कर मिल जाए। तब शायद अनुवादक को भी इनाम में माफ़ी मिल सके।]

July 27, 2010

पनहद

मैंने सोचा था
कमीनेपन की
कोई तो हद
होती होगी

इसका उल्टा जानने की
मेरी कोई इच्छा नहीं थी

पर कोई मेरे घर
आकर और खाकर
ज़बरदस्ती बता गया
कि नहीं होती
एकदम नहीं होती

July 21, 2010

भाव खाना

कुछ लोगों को भवसागर में आने से लेकर
भवसागर पार हो जाने तक लगातार
बहुत चाव से भाव खिलाया जाता है
यहाँ तक कि कभी-कभी तो उनको
भाव ही बहुत सस्ता लगने लगता है

कुछ और लोग होते हैं जो आने के बाद
कभी, कहीं, किसी तरह दूसरे लोगों से
भाव खाने का हक हासिल कर लेते हैं

ऐसे लोगों की तो गिनती ही नहीं है जो
बावर्दी या मुफ़्ती, तलवार से या मीठी छुरी से
बहुतों से बहुत सा भाव छीनने के एवज में
अपने लिए भी और अपनों के लिए भी
अपने और अपनों के सपनों के लिए भी
जितना हो सके भाव का इनाम पा लेते हैं

ऐसे भी होते हैं जिन्हें घूमते-घामते ही
हालात का चक्का बिना किसी कारण
औरों से भाव खाने का परमिट दे जाता है

बाकी रहे वो जिन्हें काव-काव करके
अपनी ज़बान तमाम जला डालने
या मुँह ही सिलने-सिलवा-लेने पर भी
कोई रत्ती भर भाव देने को राज़ी नहीं होता

उन्हें तहज़ीब को ऊपर ताक पर रख कर
पालथी मार कर और हाथ धो-धाकर
जो भी जितना भी जैसा भी और जब भी जुटे
रोकर हँस कर या बुद्धं शरणं सा भाव धर कर
खुद ही खुद को भाव खिलाना पड़ता है

May 4, 2010

सूरज-चांद

सूरज क्यों जल रहा है?
क्यों खुदकुशी कर रहा है?
शहीद होना चाह रहा है?

बुरी बात है, बुरी बात है

जल रहा है और जला रहा है
जल-जला के कह रहा है
जल रहा हूँ मैं जल रहा हूँ

बुरी बात है, बुरी बात है

पता नहीं क्या लाखों सूरज
इससे अनगिन बड़े निरंतर
जल भी रहे हैं जला भी रहे हैं

बुरी बात है, बुरी बात है

चांद का क्या ख़्याल है?

February 9, 2010

The Fundoo Funda

‘Funda’ is a Hindi word (or, more accurately, an Indian word, as it is also used in other Indian languages, including English), which is a short form of the English word fundamental. The same is the case with the word ‘fundoo’, except that is it an adjective derived from ‘funda’ according to Hindi derivational morphology. The adjective has two senses. One of these is the sense familiar to a select group of people, the kind who are educated in colleges like New Delhi’s St. Stephen’s and have a circle made up almost exclusively of people from a similar background. For this group of people, the word ‘fundoo’ means fundamentalist. And nothing else.

Thus, for them, ‘fundoo’ (the noun version) basically means a person from the Sangh Parivar. And since they (not the Sangh Parivaris) are mainly ‘secular’, it is a term of derision. Just like the other n-term they have for the Sangh Parivaris.

I first became familiar with this word when I entered an engineering college for my bachelor’s degree. In that college, the word was heavily used. It meant someone whose fundamentals (as in Thermodynamics or Theory of Machines) were very strong, i.e., who was very good at something. It could also be used with some metaphorical extension to mean high praise (with regard to anything) for someone or something. It might sound strange to many, but at that time I somehow thought that this word (and the word ‘funda’) were slang words only used in that particular college.

Later I found out that these two words are among the most heavily used words as far as the young (school or college) generation is concerned.

Being called fundoo can be a big complement, though the overuse of the term means that the complement could be highly diluted.

I didn’t become familiar (till much later) with the other sense — fundamentalist — of the word till I read a particular number of one of the most popular columns in the Indian press, written by Khushwant Singh. I had no idea that the word was also used in this sense. But what was more surprising, almost astonishing to me, was the fact that Khushwant Singh similarly seemed to have no idea that there was another sense in which this word was used.

By the way, I wrote ‘one of the most popular columns in the Indian press’ instead of ‘in the National’ or ‘in the English’ press because this particular column is syndicated by many Indian language newspapers and they publish a translation.

As I then read all kinds of magazines and newspapers etc., I found out that there were others like Khushwant Singh for whom too the word only meant one thing: fundamentalist. What was common among all these people was that they were from the select group that I mentioned in the beginning.

I have spent various periods of time in many educational institutions of India and have lived in many cities and towns and have kept my eyes and ears open, especially to language related things. Nowhere except in the writings of this group of people have I found anyone using the word ‘fundoo’ in the sense that they use. And as I said ealier, it is one of the most heavily used words and therefore I keep hearing it much too regularly.

I am aware that there might, in fact, be some other people outside this group who use the word in that rare sense. And I am not sure about the origin of the word either. It could very well be that the word was initially used in the first sense. But I have heard no one using it in that sense. Not a single person.

To repeat once more to make the point clear, the second sense of the word is used so heavily that I find it hard to believe that if you live in an Indian city or even a small town (and know either English or an Indian language), you could remain oblivious to the second sense of the word. But you could easily be unaware of the first sense because it is used so rarely. The only way this can happen is if that group of people has somehow cut itself off from the life around it and is not much in touch with it.

This cut off has to be fairly radical, because according to many yardsticks, I myself am quite cut off.

But I know the second sense. As well as the first. I knew them long before I started studying Linguistics or related fields.

Or perhaps they are words from two different languages, the first spoken by the top caste and the second by the lesser mortals.

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