अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

April 28, 2011

हक़

कोई मेरे पास आए
साथ चलने के लिए
और मैं उसे भगा दूँ
दुत्कार कर
फटकार कर
सबके सामने
बेइज्जत कर के

तब भी अगर वो ना जाए
तो मैं उसके होने को ही
नज़रअंदाज़ कर के दिखा दूँ

वो बार-बार आता रहे
और मैं बार-बार यही करूँ
तो क्या मुझे हक़ बनता है
उसे दोष देने का
इसलिए कि उसने साथ नहीं दिया
इसलिए कि वो अब साथ नहीं चल रहा
जबकि मेरी खुद की सांठ-गांठ उन्हीं से है
जिनकी यातना और दुत्कार से बचते हुए
वो मेरे पास आया था

साथ चलने के लिए
इसलिए कि किसी और को
यातना और दुत्कार दिए जाने से रोका जा सके

जबकि मुझे यही नहीं पता
कि वो क्या कर रहा है
और क्यों कर रहा है

किसी के सारे रास्ते बंद करके
(दुनिया से ही टिकट कटा लेने को छोड़ कर)
क्या कोई किसी को पाठ पढ़ा सकता है
कि जीवन कैसे जिया जाए
कि नैतिकता के मानदंड क्या हैं?

March 21, 2011

इंकलाब के पहले

अन्याय हर तरफ फैला है
पूंजी का बोलबाला है
सच का सर्वत्र मुँह काला है

ये हालात तो बदलने ही होंगे
बदलाव के हालात बनाने होंगे

तभी तो इंकलाब आएगा
हर जन अपना हक पाएगा

पर उसके पहले बहुत से काम
जो अभी तक पूरे नहीं हुए
वो सब के सब निपटाने होंगे

वो कोने में जिसे अधमरा करके
बड़े दिनों से डाल रखा है
वो अब भी, हद है आखिर,
कभी-कभार बड़-बड़ किए रहता है

उसे सबक सिखाना होगा
उसके भौंकने को बंद कराना होगा
पहला बड़ा काम तो यही है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

फिर आपस के झगड़े भी तो हैं
तगड़े हैं, एक से एक बढ़ के हैं
एक-दूसरे को सबक सिखाना होगा
एक-दूसरे का भौंकना बंद कराना होगा

दूसरा बड़ा काम यह भी तो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

फिर कुछ डरे सहमे
असुरक्षित लोगों ने
अपनी बुद्धि का
अपने ज्ञान का
और तो और
अपनी प्रतिभा का!
(हद है!, हद है!
कितनी अकड़ है!)
आतंक फैला रखा है
यहीं, इंकलाबियों के बीच!

उनका मटियामेट कर के ही
सच्चे इंकलाबी दम ले सकते हैं
उन्हें अपने साथ लाकर नहीं

एक तीसरा बड़ा काम यह जो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

ऐसे कितने ही काम और हैं
जिन्हें निपटाना है
इंकलाब के पहले

इसी से याद आया
एक काम तो यही है
कि इन कामों में
जो अड़चन पहुँचाए
उसे हड़का-हड़का के
आपसी झगड़े
ज़रा देर को भुला के
मिल-जुल कर
ऊपर पहुँचाया जाए

इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

October 21, 2010

कवि परीक्षा

एक बार जब हमने कुछ कविताएँ लिख डाली थीं तो हुआ ये कि एक दिन हमें उनमें से कुछ को दुबारा पढ़ते हुए लगा कि हिन्दी की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं और बहुत सी किताबों में भी जो कविताएँ छपा करती हैं उनसे ये कुछ बुरी तो नहीं हैं। बल्कि हमें ईमानदारी से लगा कि उनमें से अधिकतर से तो अच्छी ही हैं। तो साहब हमने सोचा कि इन्हें खुद ही पढ़-पढ़ कर कैसे चलेगा, क्यों ना इन्हें छपवाने की कोशिश की जाए। फिर क्या था, हमने उनकी एक-एक कॉपी निकाल कर एक फ़ाइल में सजाया जैसे नौकरी का उम्मीदवार अपनी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र सजाता है। इस फ़ाइल को एक अच्छे से बैग में, जो मुफ़्त में कहीं से कभी मिला था, रख कर पहुँच गए एक प्रकाशक के दफ़्तर।

दफ़्तर कोई शानदार नहीं था, लेकिन हिन्दी, वो भी साहित्य, का प्रकाशन दफ़्तर होने के लिहाज से बुरा भी नहीं था। लगता था यहाँ कुछ पाठ्यपुस्तकें या कॉफ़ी टेबल टाइप की किताबें भी छपती होंगी। हो सकता है धार्मिक पुस्तकें भी छपती हों। लगा शायद कविता छपने का कुछ मानदेय भी मिल सकता है। और तो और, एक रिसेप्शनिस्ट भी थी। उसी ने दफ़्तर की हिन्दी-सापेक्ष शान से ध्यान हटा कर पूछा कि क्या चाहिए। गलत मत समझिए, पूछा ऐसे शब्दों में ही था जैसे शब्दों में कोई रिसेप्शनिस्ट पूछती है, पर हमें ऐसे शब्द ठीक से याद नहीं रह पाते।

उद्देश्य बताने पर उसने एक फ़ॉर्म जैसा पकड़ा दिया। पूछा तो बताया कि ये कुछ सवालों की लिस्ट है जिनके जवाब देने के बाद ही संपादक से मिल कर कविता के बारे में बात हो सकती है। सवाल कुछ ऐसे ही थे जैसे किसी झटपट परीक्षा में पूछे जाते हैँ। अब हमने इतनी और ऐसी-ऐसी परीक्षाएँ दी हैं कि कुछ सोचे बिना ही सवाल मुँह से निकल पड़ा कि इस परीक्षा में पास मार्क्स कितने हैं। रिसेप्शनिस्ट ने नाराज़ सा होकर कहा कि पास मार्क्स क्या मतलब, यह साहित्य प्रकाशन का दफ़्तर है। फिर बोली कि वैसे कम से कम तैंतीस प्रतिशत सवालों के जवाब सही होने पर ही कविता छापने की संभावना पर गौर किया जाएगा। जब हमने पूछा कि ये क्या कोई नया इंतज़ाम है, तो बोली कि नहीं ऐसा तो न जाने कब से हो रहा है। कमाल की बात है, हम अपने-आप को साहित्य का बड़ा तगड़ा जानकार समझते थे और हमें ये बात पता ही नहीं थी।

उन सवालों में से जितने याद पड़ते हैं, उन्हें नीचे दिया जाता है। भाषा के बारे में जो ऊपर कहा गया उसे ध्यान में रखा जाए। सवालों का क्रम बिगड़ा हुआ हो सकता है।

  1. आप कला से हैं या विज्ञान से?
  2. आप कोई मंत्री, अफ़सर या कम-से-कम प्रोफ़ेसर हैं?
  3. आपकी कविताओं में से कितनी प्रकृति-प्रेम की कविताएँ है?
  4. आपकी कविताओं में से कितनी प्रेम कविताएँ है?
  5. आपकी कविता से कभी कोई लड़की पटी है?
  6. आपकी कविता पढ़ कर कभी किसी हसीना ने आपको ख़ुतूत लिखे हैं?
  7. माफ़ करें, लेकिन क्या आप खुद हसीना हैं?
  8. आपने कभी याराने-दोस्ताने पर कोई कविता लिखी है?
  9. आपके दोस्तों की संख्या कितनी है?
  10. क्या आपकी कोई प्रेमिका है?
  11. क्या आप शादी-शुदा हैं?
  12. क्या आप अपनी घरवाली से प्रेम करते हैं?
  13. आपकी कविताओं में से कितनी वीर रस की कविताएँ हैं?
  14. आपकी कविताओं को कोई गाता-वाता है?
  15. आपकी कविताओं में से कितनी गाने लायक हैं?
  16. आपके कवि-गुरू कौन थे?
  17. क्या आपने उनकी जितना हो सका सेवा की?
  18. आप कवियों की संगत में रहे हैं?
  19. क्या आपने काफ़ी समय कॉफ़ी हाउस में बहस करते हुए गुज़ारा है?
  20. आप किसी कवि से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  21. आप किसी भी बड़े आदमी से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  22. आप किसी से भी सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  23. आपने जो कविताएँ अभी लिखी हैं, उन्हें ब्लॉग वगैरह पर तो नहीं डाल रखा?
  24. आप ब्लॉग लेखक तो नहीं हैं?
  25. आपने कोई महाकाव्य लिखा है?
  26. आपने कोई खंडकाव्य लिखा है?
  27. आपने कोई लंबी कविता लिखी है?
  28. आपने किसी कवि-सम्मेलन या मुशायरे में कविता पढ़ी है?
  29. आपकी कविता कभी किसी फ़िल्म में शामिल हुई है?
  30. आपकी कविता कभी किसी नाटक में शामिल हुई है?
  31. आपको कविता लिखने के लिए कभी कोई फेलोशिप आदि मिली है?
  32. आप हिन्दी साहित्य के किसी गुट के सधे हुए सदस्य हैं?
  33. अगर हम आपकी कविताओं का संग्रह छाप दें तो क्या आप उसकी एक हज़ार या अधिक प्रतियाँ खरीदने के लिए तैयार हैं?
  34. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप अपने कविता संग्रह को कहीं पाठ्यपुस्तक बनवा सकें?
  35. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकें?
  36. क्या आप खुद हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकते हैं?
  37. क्या आप धार्मिक कविताएँ लिखते हैं?
  38. क्या आप राष्ट्रवादी कविताएँ लिखते हैं?
  39. क्या आपकी कविताओं की राजनीति पाठकों के किसी खास समूह को एक साथ आकर्षित कर सकती है?
  40. क्या आपकी कविताएँ किसी प्रतिष्ठित परंपरा की हैं?
  41. क्या आप कविता की किसी नई परंपरा के प्रवर्तन का दावा करते हैं?
  42. क्या आप समझते हैं कि आपके जैसी कविताएँ आजकल फ़ैशन में हैं?
  43. क्या आपकी कविताएँ पहले कहीं छपी हैं?
  44. आपके ही नाम वाला कोई कवि पहले से तो मौजूद नहीं है?
  45. आप पहले से दूसरों की कविताओं के अनुवादक तो नहीं हैं?

इतना तो हमें मालूम है कि नौकरी के उम्मीदवार को, खास तौर से अगर वो नया हो, अक्सर कहाँ पता होता है कि उसकी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र किसी खास काम के नहीं हैं। उनकी ज़रूरत सिर्फ़ उम्मीदवारों (कैसा बढ़िया शब्द है!) की भीड़ का आकार नियंत्रण में रखने के लिए होती है। पर यहाँ तो पता चला कि मामले का प्रमाणपत्र तक पहुँचना ही दूर की बात है।

अपन तो चुपके से भाग आए वहाँ से। बेस्ती हो जाती। आज तक कभी डबल ज़ीरो नहीं आया।

October 14, 2010

खुश हुआ खुश हुआ

[ये श्री अनिल एकलव्य जी के एक विद्वतापूर्ण शोधपरक लेख का खड़ी बोली कविता में अनुवाद है। मूल लेख बिजली के खेल में हुए हार्ड डिस्क क्रैश के कारण खो गया है। उसे रिकवर करने की कोशिश चल रही है। तब तक यही सही।]

जंगल-जंगल पता चला है
धोती पहन के मोगैंबो खिला है
पगड़ी पहन के गब्बर सिंह सजा है

पिछली बार जो लठैतों-डकैतों ने
तोड़ा-फोड़ी और पिटाई की वो याद ही है तुम्हें
तो ये मसला अब बहुत लंबा खिंच गया है
जज साहिबान, अब इसे लॉक किया जाए

अबकी अगर शामत न आई हो
तो समझ से काम लो और चुप बैठो
हमने रियायत कर दी है तुम्हारे साथ
पर लठैत-डकैत अभी संत नहीं हो लिए हैं

ज़रूरत पड़ी तो जो कहा गया था
वही होगा
तलवारें निकल आएंगी म्यान से
और जो भी करेगा विरोध
वो जाएगा जान से

हाँ, ये ठीक है – अबकी कोई शोर नहीं
बड़ा डिग्नीफ़ाइड रिस्पौंस रहा है
लगे रहो, जमे रहो, सीख जाओगे

खुश हुआ, मोगैंबो खुश हुआ
गब्बर सिंह को ये शरीफ़ाना नाच
ब-हु-त पसंद आया
ये परिवार के साथ देखने लायक है

परिवार समझते हो ना?
क्या करें
आजकल के बच्चे परिवार संस्कार
सब भूलते जा रहे हैं

उसके बारे में भी कुछ करेंगे
सर्च एंजिन वालों से भी बात चलाई है
पर फिलहाल तो इस फिल्म को
अगले साल ऑस्कर में भेजेंगे

[कविता में किए इस अनुवाद में घटिया फ़िल्मों का ज़िक्र आने का ऐसा है कि अनुवादक बेचारा खुद एक भयंकर घटिया फ़िल्म में एक ऐक्स्ट्रा है। दुआ कीजिए कि इस नई फ़िल्म को ऑस्कर मिल जाए। तब शायद अनुवादक को भी इनाम में माफ़ी मिल सके।]

July 27, 2010

पनहद

मैंने सोचा था
कमीनेपन की
कोई तो हद
होती होगी

इसका उल्टा जानने की
मेरी कोई इच्छा नहीं थी

पर कोई मेरे घर
आकर और खाकर
ज़बरदस्ती बता गया
कि नहीं होती
एकदम नहीं होती

July 21, 2010

भाव खाना

कुछ लोगों को भवसागर में आने से लेकर
भवसागर पार हो जाने तक लगातार
बहुत चाव से भाव खिलाया जाता है
यहाँ तक कि कभी-कभी तो उनको
भाव ही बहुत सस्ता लगने लगता है

कुछ और लोग होते हैं जो आने के बाद
कभी, कहीं, किसी तरह दूसरे लोगों से
भाव खाने का हक हासिल कर लेते हैं

ऐसे लोगों की तो गिनती ही नहीं है जो
बावर्दी या मुफ़्ती, तलवार से या मीठी छुरी से
बहुतों से बहुत सा भाव छीनने के एवज में
अपने लिए भी और अपनों के लिए भी
अपने और अपनों के सपनों के लिए भी
जितना हो सके भाव का इनाम पा लेते हैं

ऐसे भी होते हैं जिन्हें घूमते-घामते ही
हालात का चक्का बिना किसी कारण
औरों से भाव खाने का परमिट दे जाता है

बाकी रहे वो जिन्हें काव-काव करके
अपनी ज़बान तमाम जला डालने
या मुँह ही सिलने-सिलवा-लेने पर भी
कोई रत्ती भर भाव देने को राज़ी नहीं होता

उन्हें तहज़ीब को ऊपर ताक पर रख कर
पालथी मार कर और हाथ धो-धाकर
जो भी जितना भी जैसा भी और जब भी जुटे
रोकर हँस कर या बुद्धं शरणं सा भाव धर कर
खुद ही खुद को भाव खिलाना पड़ता है

May 4, 2010

सूरज-चांद

सूरज क्यों जल रहा है?
क्यों खुदकुशी कर रहा है?
शहीद होना चाह रहा है?

बुरी बात है, बुरी बात है

जल रहा है और जला रहा है
जल-जला के कह रहा है
जल रहा हूँ मैं जल रहा हूँ

बुरी बात है, बुरी बात है

पता नहीं क्या लाखों सूरज
इससे अनगिन बड़े निरंतर
जल भी रहे हैं जला भी रहे हैं

बुरी बात है, बुरी बात है

चांद का क्या ख़्याल है?

February 18, 2010

Street to Worridor-Morridor

There was a window on my right
And there was a window on my left
I was walking in a narrow corridor
There seemed to be a similar one on my right
Just as there was one on my left
Someone was walking in the right corridor
At my pace, almost in step with me
Someone was walking in the left one too

The windows were only a few feet wide
They were as high as the tallest man
And they started out from the very floor
One was followed by another
And was preceded by one too
On either side of me

But I could see only a few windows ahead
And a few behind
I just couldn’t see further

As I walked past a pair
Another pair came into the view ahead
Just as one disappeared behind me
There were windows but no doors

I couldn’t remember what building I was in
Its front door, the path leading to it
I couldn’t remember how I got there, or why
The last thing I could remember
Was that I was walking on an open street
People were walking on my left
And they were also there on my right

The most that my memory seemed to be saying
Was that the open street had simply
Become the narrow corridor
And I felt as if I had a part in this
And I desperately wanted to say
That I had resisted, that I did

I couldn’t see the end of the corridor
I turned back, but I couldn’t see the entrance
I turned several times to make sure
But then I realized I had forgotten
Even the direction I was walking in
Whichever side I turned
The people on the right
As well as the people on the left
Were facing the same way as me

I looked up at the ceiling
And I looked down at the floor
They seemed quite ordinary and stable
But I noticed small holes in both
One hole per pair of windows
I bent down and tried to look
Through the one on the floor
There was something below
But I couldn’t make out what
I could see shapes and figures
I could see some movement
But I didn’t know what it meant
Still, one side of my mind
Continuously kept telling me
That I knew everything
About what was below

The ceiling was too high for me to try
But the same side of my mind was telling me
That I knew something about
What was above too

I walked in the corridor for a long time
Long as long can be
Going past windows past windows past windows
Then I started noticing some sounds
It took me a while to recognize them

One was like a loud splash
Another was that of a sudden snap
One was intense, condensed and explosive
Another was of total suffocation
One sounded like a painful gargle
But I couldn’t recognize them all

With each of these sounds was an empty window
One sound and one empty window
On my left as well as on my right
One after the other and another after that one

The head whirled for a while
Then all became very quiet
The windows were no longer empty
But there was something odd
I could see myself on my right
And so could I on my left

The windows had all become mirrors
And all I could think of doing
Was to wait for a sound
But I couldn’t help hoping
That it would be something different

June 16, 2009

Walls have Fears

On walls live creatures
They don’t just have ears
They have eyes and they have teeth
And they sure don’t have tears

What adds to their terrors
Is that they can’t be easily seen
But you can feel their presence
If you are one of their victims

They can communicate with each other
With a system more sophisticated
Than that of elephants or whales
It’s so sophisticated that only
Intelligent Design can explain them

They have concrete manifestations
But they are mostly abstract
No wonder so is their food
They don’t eat your meat
They eat your lives and your work and your protestations

You can be safe from them if you want
It’s all a matter of belief and loyalty and obedience
As it has always been through the ages
With other kinds of fearsome creatures

The question is whether you accept
The benevolent supremacy of the Intelligent Designer
Who put them there to watch over you

Just believe and abide and salvation can be yours
Don’t and you, with your work and your life
Can be completely mucked up, inside and outdoors

May 29, 2009

Milk as Karma

Someone called someone milk
Milk as noun or milk as verb?
Milk as the subject or milk as the object?
Milk as the karta or milk as the karma?

The answer appears as a vision
Of huge torrents of something
(It could very well be milk
Of, you know, something)
Flowing from one end
Of the Zipf’s Law curve
To the other end

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